शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

कोई उम्मीद न अब करेँगे कभी

कोई उम्मीद न अब करेँगे कभी,
ना कोई इरादे रखेँगे कभी।
दिल की बस्ती जला कर न मुमकिन हुआ
चैन से आशियाना किसी का कभी॥

दिल मेँ अरमान मेरे सुलगते रहे।

उम्र भर तेरे गम से तडपते रहे।
दिल मेँ अरमान मेरे सुलगते रहे।
होके तुमसे जुदा चैन पाया नहीँ
नैन सावन से मेरे बरसते रहे।।

निकले मेरा जनाजा,शहनाई तुम बजाना।

निकले मेरा जनाजा,शहनाई तुम बजाना।
मैय्यत पे मेरी जालिम, आँसू न तुम बहाना॥

कुछ इस कदर सताते रहे मुझको जमाने वाले।

कुछ इस कदर सताते रहे मुझको जमाने वाले।
बेखुदी से पेश आते रहे अपना बताने वाले॥

हम ये समझ कर उनको अपना बनाते रहे।

हम ये समझ कर उनको अपना बनाते रहे।
कि वो मेरे दिल की गहराइयों में समाते रहे॥

जिनसे मिलने को तरसती रहीं ये आँखें।

जिनसे मिलने को तरसती रहीं ये आँखें।
वो न आए मगर बरसती रहीं ये आँखें॥

वो नजरेँ झुका के शरमाना उनका।

वो नजरेँ झुका के शरमाना उनका।
वो कुछ इस तरह मुस्कुराना उनका॥

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

फूलोँ से खुशबू आती ही रहेगी।

फूलोँ से खुशबू आती ही रहेगी।
शाम फिजाओँ मेँ गुनगुनाती ही रहेगी॥

गीत खुशियोँ के गाया करेँगे।

गीत खुशियोँ के गाया करेँगे।
तुझे देख कर मुस्कुराया करेँगे॥

किसी शायर का तुसुब्बुर हो

किसी शायर का तुसुब्बुर हो तो गजल बन जाती है।
गर आशिक की चाहत हो दीवानगी कहलाती है॥

तेरी खुशी ही नहीँ तेरे गम से भी नाता है।

तेरी खुशी ही नहीँ तेरे गम से भी नाता है।
तुझे पाकर के ये दिल कुछ यूँ इतराता है॥

क्योँ इतना किसी को सताती है गरीबी।

क्योँ इतना किसी को सताती है गरीबी।
बेकसूरोँ को क्योँ रुलाती है गरीबी॥

शनिवार, 15 अगस्त 2015

जियो तो जियो मुस्कुरा कर जियो।

जियो तो जियो मुस्कुरा कर जियो।
दर्द को जिन्दगी मेँ भुला कर जियो॥

तू बेवफा थी वफा की राहोँ पे कहाँ से आती

तू बेवफा थी वफा की राहोँ पे कहाँ से आती

तू बेवफा थी वफा की राहोँ पे कहाँ से आती

मेरी खता ये थी कि मैने तुमसे प्यार किया॥
वफा की राहोँ पे तेरा इन्तजार किया॥

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

तेरी खुशियोँ मेँ हम भी खुश होँगे

दिल के करीब से होके गुज़रती हैँ जब वो तेरी बातेँ।
इक दर्द सा देती है तन्हा रातेँ॥

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

आतिश-ए-हिज़्र में उसकी

आतिश-ए-हिज़्र में उसकी, ताउमर जलते रहे।
नहीं बरसे वो बादल, कभी जो गरजते रहे।।

बुधवार, 12 अगस्त 2015

जख़्म-ए-दिल को अल्फ़ाजों में बयाँ करते हैं।

जख़्म-ए-दिल को अल्फ़ाजों में बयाँ करते हैं।
कोई आके कहे, हम कौन सा गुनाह करते हैं।।