गुरुवार, 13 अगस्त 2015

आतिश-ए-हिज़्र में उसकी

आतिश-ए-हिज़्र में उसकी, ताउमर जलते रहे।
नहीं बरसे वो बादल, कभी जो गरजते रहे।।

दफ्न कर दी हर ख्वाहिश, उम्मीद-ए-चाहत में,

सज़दे में, उसे पाने की, बस आरजू करते रहे।।

जालिम़ न आया लौटकर, तमाम जिन्दग़ी,
फक्त दीद-ए-यार को, ताउमर तरसते रहे।।

इक आईना कर बैठा था, पत्थर से दोस्ती,
नतीज़ा-ए- ख़ता, टूटकर बिखरते रहे।।

हो गया तब्दील अश्कों में, ख्वाब-ए-दिल हस़ीं,
अरमान-ए-दिल आब-ए-चश्म, बनकर बरसते रहे।।

अन्दाज़-ए-बेवफ़ाई उनका, कितना हस़ीं था 'प्रदीप'
हम इस अदा को भी, मुहब्बत समझते रहे।।


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