शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

हम ये समझ कर उनको अपना बनाते रहे।

हम ये समझ कर उनको अपना बनाते रहे।
कि वो मेरे दिल की गहराइयों में समाते रहे॥

उनके पास मुझसे मिलने का कभी वक्त न हुआ
हम उनके इन्तजार में पलके बिछाते रहे॥

शहनाइयों की सदा आती दिखी अब तो
कभी तो वो हमें अपना बताते रहे॥

मेरे गुलशन की शाम-ए-फिजा थी वो
मेरे जख्मों को हवा कर के मुस्कुराते रहे॥

मेरी फितरत ये कभी न हुई "प्रदीप"
कि चाहने वालों का ही दिल दुखाते रहे॥

रचनाकार : प्रदीप कुमार पाण्डेय