गुरुवार, 20 अगस्त 2015

किसी शायर का तुसुब्बुर हो

किसी शायर का तुसुब्बुर हो तो गजल बन जाती है।
गर आशिक की चाहत हो दीवानगी कहलाती है॥

फिर जमाने के दस्तूरोँ को रस्मोँ का नाम मिलता है
कोई अपना न हो तो तन्हाई आ जाती है॥

समन्दर की लहरोँ को देख कर इक ख्याल दिल मेँ पनपता है
दिल के गुलशन मेँ यादोँ की कली खिलाई जाती है॥

खामोँशियोँ के दरमियाँ कुछ एहसास होता है "प्रदीप"
ऐसा लगता है सदा-ए-शहनाई आती है॥


रचनाकार : प्रदीप कुमार पाण्डेय