मंगलवार, 30 अगस्त 2016

आतिश-ए-गम मेँ जल रहा दिल-ए-दीवाना है

आतिश-ए-गम में, जल रहा दिल-ए-दीवाना है॥
कितना खामोश, मोहब्बत का ये तराना है॥

याद माज़ी की, सताती है बेकरारी में,
आज के दौर में, जालिम हुआ जमाना है॥

खैर इस बात को, यहीं पे दफ्न करते हैं,
बेसबब ही इसे, आगे नहीं बढाना है॥

इन्तिहाँ हो चुकी क्या, तेरी बेवफाई की,
या और भी अभी, मेरी चाहत को आजमाना है॥

तुझे मैं पा सकूँ, ये मेरा नहीं मुकद्दर है,
आतिश-ए-हिज्र में, दिल को यूँ ही जलाना है॥

फिर भी सबर करें, तो बता किस कदर करें,
हमारे दिल में क्या, सबर का कारखाना है॥

जीने की दिल से हशरत, मिटती सी जा रही है,
आगोश-ए-मौत के सिवा, न ठौर न ठिकाना है॥

जालिम जमाने से करें, उम्मीद क्या "प्रदीप"
नफरत में जिसकी जल चुका, मेरा आशियाना है॥

रचनाकार: प्रदीप कुमार पाण्डेय