सोमवार, 29 अगस्त 2016

ज़ख्म-ए-दिल को, अल्फ़ाजों में बयाँ करते हैं

ज़ख्म-ए-दिल को अल्फ़ाजों में बयाँ करते हैं ।
कोई बताए तो सही, हम कौन सा गुनाह करते हैं ।।

वो भूल गया हमें, चन्द रोज़ों में दूर जाकर,
जिसकी मुहब्बत की हम, चर्चा आम करते हैं।।

दर्द-ए-दिल ही, अब मेरा हमसफ़र है यारों,
अपनी ज़िन्दगी हम, बस इसी के नाम करते हैं।।

वक्त मिला कभी तो, फिर गुफ़्तगू होगी,
"प्रदीप" ये बात, यहीं तमाम करते हैं।।

रचनाकार: प्रदीप कुमार पाण्डेय