सोमवार, 29 अगस्त 2016

कोई चाँद पे, कोई सितारों पे लिखा करता है।

कोई चाँद पे, कोई सितारों पे लिखा करता है।
कोई एक पे, कोई हज़ारों पे लिखा करता है।।

किसी को पसंद है लिखना भरी महफ़िल पे,
कोई होता है, जो बेसहारों पे लिखा करता है।।

कोई देख आया है, गहराइयाँ समन्दर की भी,
कोई अभी भी, मह़ज किनारों पे लिखा करता है।।

हुआ करते हैं जुदा, दस्तूर लिखे जाने के भी,
कोई नज़र पे, कोई नज़ारों पे लिखा करता है।।

"प्रदीप" का भी अपना, इक अंदाज़ है लिखने का,
कुछ हो न हो जो फक्त, इशारों पे लिखा करता है।।

रचनाकार: प्रदीप कुमार पाण्डेय