शनिवार, 3 सितंबर 2016

होगा दीदार उनका कभी न कभी


होगा दीदार उनका कभी न कभी, ख़्वाब बस दिल मेँ यूँ ही सजाते रहो।
होगा एहसास उनको कभी न कभी, गीत चाहत के तुम गुनगुनाते रहो॥

फितरत से बेवफा ये होता है जमाना।
क्या ढूँढ के लाए हो न मिलने का बहाना।
भूले थे जिन्दगी जब तुझको दिया था दिल,
दुनियाँ को अब भूला हूँ फिर बनकर के दीवाना।
चाहत बडी बेदर्द है जालिम है जहाँ मेँ,
चाहत मेँ ही शमाँ की जलता है परवाना।
जिसको बचाया हमने आँधी से तूफाँ से,
वो भी जला के चल दिया मेरा ही ठिकाना॥

मुश्किलेँ आसाँ होगी कभी न कभी, प्यार से बस यूँ ही मुस्कुराते रहो॥
होगा दीदार उनका कभी न कभी, ख्याब बस दिल मेँ यूँ ही सजाते रहो॥

हाल पे मेरे तेरा मुस्कुराना ठीक नहीँ,
तीर नजरोँ के दिल पे चलाना ठीक नहीँ।
वजूद-ओ-अदम की है हमेँ परवाह नहीँ
हुस्न की आग से दिल को जलाना ठीक नही॥
बात जब पीने की आये तो मुकरना कैसा,
न पीना हो तो मैखानोँ पे जाना ठीक नहीँ,
इंसान हो इंसान ही बन के रहा करो,
दिल-ए-दीवानोँ पे खंज़र चलाना ठीक नहीँ॥

होगा उनको यकीँ भी कभी न कभी, याद मेँ उनकी दिल को जलाते रहो॥
होगा दीदार उनका कभी न कभी, ख्याब बस दिल मेँ यूँ ही सजाते रहो॥