रविवार, 11 सितंबर 2016

इस शहजादी को अपना बना के रहेंगे


जोर जवानी का, दिखा के रहेंगे। 
कीमत कुर्बानी की, बता के रहेंगे।।

भेंड़िये क्या आएंगे, शेर के आगे,
आये तो मौत से, मिला के रहेंगे।।

जुदा होके न रह सकता, दिल ज़िस्म से कभी,
ये रिवायत आवाम-ए-मुल्क को, सिखा के रहेंगे।।

ख्वाब-ओ-आईना होते हैं, जो पल में टूट जाते हैं,
हम आशिक इरादों के हैं, मंज़िल पा के रहेंगे।।

हममें वो जोश-ओ-ज़ज़्बा है, तूफानों में भी,
कस्ती साहिल तक, पहुँचा के रहेंगे।।

अज़ल तक अमन-ओ-चैन की, दिली तमन्ना है "प्रदीप",
दुश्मन लाख चाहे, इस शहजादी को अपना बना के रहेंगे।।

रचनाकार: प्रदीप कुमार पाण्डेय "प्रदीप"