शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

मेरी आवाज़ पे कुछ यूँ, वो अपना सर उठाते हैं



मेरी आवाज़ पे कुछ यूँ, वो अपना सर उठाते हैं।
लोग सो कर ज्यों अपना, सुबह बिस्तर उठाते हैं॥


तुम्हारे शहर में, मैय्यत को भी कांधा नहीं देते,
हमारे गाँव में मिल कर के, सब छप्पर उठाते हैं॥


सम्भलता है नहीं जिनसे, दुपट्टा तक कभी-कभी,
वो नाजुक हाथ भी क्या, कभी खंज़र उठाते हैं॥


घर से नहीं नकले हैं जो, बारिश के मौसम में,
नादाँ वो कास्तियों के, क्यों लंगर उठाते हैं॥


गम के सिवा जिनको नहीं, कुछ भी मिला कभी,
दर्द-ए-दिल के पलकों पे, फ़कत मंज़र उठाते हैं॥


उम्मीद कोई अब नहीं, रह गई "प्रदीप"
हर मोड पे हम बस, कोई ठोकर उठाते हैं॥


रचनाकार: प्रदीप कुमार पाण्डेय