सोमवार, 5 सितंबर 2016

मिला है तोहफा-ए-दिल, लगाने के लिए



मिला है तोहफा-ए-दिल, लगाने के लिए।
होती है खुशी दो पल की, मुस्कुराने के लिए॥

कितनी गुजरी हैँ मोहब्बत, की बहारेँ आकर,
रह गया दर्द दिल मेँ, छुपाने के लिए।।

इश्क के रास्ते पे गुजरी तमाम जिन्दगी है,
बाकी उमर बची है फकत, मैखाने के लिए॥

रहवर हमारा हवा, जख्मोँ को मेरे करके,
हो गया जुदा, क्या पता क्या सिखाने के लिए॥

दौर-ए-मोहब्बतोँ मेँ गुजारी हजारों शब-ए-गम,
अब भी हाजिर है दिल, रश्मेँ निभाने के लिए॥

खुद को भुला कर उनकी यादोँ को सजाया दिल मेँ,
लिखी गज़ल भी "प्रदीप" जमाने के लिए॥

रचनाकार: प्रदीप कुमार पाण्डेय