शनिवार, 17 सितंबर 2016

नैन सावन से मेरे, बरसने लगे


दिल के अरमाँ मेरे, अश्क बन के बहे,
उनसे मिलने को भी, हम तरसने लगे। 
मुझको मेरी वफ़ा का मिला क्या सिला,
नैन सावन से मेरे, बरसने लगे।।

उसने वादा किया, वक़्त-ए-इज़हार में,
साथ हम ज़िन्दगी भर, रहेंगे सनम। 
प्यार में उसने इकरार, कर के कहा,
साथ ही इस जहाँ से, चलेंगे सनम।।
प्यार के ज़ाल में, दिल मेरा फस गया,
हम तो ख्वाबों में, यूँ ही मचलने लगे। 
मुझको मेरी वफ़ा का, मिला क्या सिला,
नैन सावन से मेरे, बरसने लगे।।

जी नहीं पाएंगे, बिन तेरे जान-ए-मन,
दूर तुम मुझसे, दिलवर न जाना कभी। 
साँसे मेरी हैं अब, धड़कनों से तेरी,
दिल न मुझसे सनम, तू हटाना कभी।।
चाँदनी चाँद के बिन, न होती कभी,
उसकी बातों से, हम भी बहकने लगे। 
मुझको मेरी वफ़ा का मिला क्या सिला,
नैन सावन से मेरे, बरसने लगे।।

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वो समझने लगी थी, मुकद्दर मुझे,
मैं समझने लगा उसको, तकदीर सा। 
आईना उसका चेहरा, मुझे लगता था,
मेरा चेहरा उसे, लगता तस्वीर सा।।
आँख से आँख मिल, दिल से दिल मिल गये,
फूल दो ज़िन्दगी के, महकने लगे। 
मुझको मेरी वफ़ा का मिला क्या सिला,
नैन सावन से मेरे, बरसने लगे।।

पहुंची जब मेरी कस्ती थी, मझधार में,
बेवफ़ाई की लहरें थी, आने लगी। 
मेरा हमदर्द था, फिर भी इक दर्द था,
मेरी धड़कन वो, दिल की बढ़ाने लगी।।
मुझको अहसास मेरी, खता का हुआ,
टूट कर मेरे अरमाँ, बिखरने लगे।।
मुझको मेरी वफ़ा का मिला क्या सिला,
नैन सावन से मेरे, बरसने लगे।।

आ गया एक नफ़रत का तूफ़ान फिर,
जिसका डर था मुझे, फिर वही हो गया। 
अजनवी उस चमन का, हुआ बागवाँ,
दूर वो, ताउमर के लिए हो गया।।
दूर उल्फ़त से, दिल मेरा होने लगा,
शायरी याद में उसकी, करने लगे। 
मुझको मेरी वफ़ा का मिला क्या सिला,
नैन सावन से मेरे, बरसने लगे।।


रचनाकार: प्रदीप कुमार पाण्डेय "प्रदीप"