शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

शब-ए-गम की, वो सहर चाहता है



शब-ए-गम की वो, सहर चाहता है।
तुझे देखना इक, नज़र चाहता है॥


गमगीन है, गमज़दा, है गऩीमत,
फिर भी तुझे, ताउमर चाहता है॥


सहता रहा, जुर्म-ओ-इल्जाम कितने,
तुझे होके जहाँ से, बेखबर चाहता है॥


चाँदनी ठहरी तू, होके वो आफताब,
जिन्दगी मेँ तुझे, रहबर चाहता है॥


उसकी मंजिल तलक, जो दे पहुँचा उसे,
कोई ऐसा ही तो, हमसफ़र चाहता है॥


बाद तेरे रही, इक तमन्ना "प्रदीप"
सिर्फ होना वो अब, शायर चाहता है॥


रचनाकार; प्रदीप कुमार पाण्डेय