शनिवार, 3 सितंबर 2016

उस रात सदा-ए-शहनाई आती रही


उस रात सदा-ए-शहनाई आती रही।
इक याद दिल के अरमानोँ को जलाती रही॥

कितनी सिद्दत से जगायी होगी उम्मीद दिल मेँ उसने,
बेबस आँखेँ भी उसे पानी सा बहाती रही॥

आँसू बहा रही थी उसकी किस्मत भी खामोशी से,
मगर बदनसीबी उस पर मुस्कुराती रही॥

आज वो जान कर अनजान बन गई उसकी,
याद मेँ उस शख्स की जान सी जाती रही॥

ऐसा किया था तिलिस्म अपनी अदा का उसने,
नीँद तो क्या मौत भी आने मेँ शरमाती रही॥

ऐसा लगा कि मुद्दते गुजर गईँ "प्रदीप",
वो शब भी कैसी थी कि गम ही बढाती रही॥