रविवार, 29 जनवरी 2017

हमारे गीत भी दुनिया, हमारे बाद गायेगी




अभी तक जो अधूरी है, कहानी मैं सुनाता हूँ।
लिखे जो गीत हैं अब तक, उन्हें अब गुनगुनाता हूँ।
ज़रा तुम गौर से सुनना, हमारे दिल की फरियादे,
अभी तक जो दबी थीं अब, उन्हें होठों पे लाता हूँ।।


किसी के हिज्र में जलकर, तबाही खुद की क्या करना।
गुनाहों की अदालत में, गवाही खुद की क्या करना।
मिले आँसू जो तोहफ़े में, तो हम हँसकर के पी लेंगे,
भरी महफिल में रोकर के, रुस्वाई खुद की क्या करना।।


उसे भी एक दिन मेरी, मुहब्बत याद आयेगी।
वो अपनो से ही रूसवाई, बेतादाद पायेगी।
हमारी कद्र तो अब तक, जमाने में नहीं लेकिन,
हमारे गीत भी दुनिया, हमारे बाद गायेगी।।