सोमवार, 9 जनवरी 2017

जीवन ज्योति जगाने वाली जननी का



जिसके आंचल में खेला उस अवनी का।
सूरज, चाँद,सितारे, दिन का रजनी का।
जीवन देकर के भी ऋण न चुका पाऊं,
जीवन ज्योति जगाने वाली जननी का।।


षड्यंत्रों की अब भरमारी लगती है।
सांसे गिनना भी दुश्वारी लगती है।
आओ हम सब मिलकर के आह्वान करें,
भारत माता जिसको प्यारी लगती है।।


निज शोणित से भाल सजाये बैठे हैं।
बलिदानों की ढाल सजाये बैठे हैं।
अपने प्राणों की आहुति दे देने को,
हम जीवन की थाल सजाये बैठे हैं।।


लाचारीे ने मुझको कुछ कहने न दिया।
अन्तर्मन ने फिर भी चुप रहने न दिया।
निज गीतों में वो सागर छलकाया है,
जिसको आँसू बनकर के बहने न दिया।।