शनिवार, 28 जनवरी 2017

तेरे हिज्र में अपना दामन भिगोता रहा



तेरे में अपना भिगोता रहा।
मैं की में रोता रहा।।


तमाम रातें हैं मेरी बदहाली की,
पूछ देखो जागता रहा या कि सोता रहा।।


तू अनजान था, शायद खबर नहीं होगी,
मेरे दिल पे क्या क्या होता रहा।।


दिल नादान था जमाने को परवाह न थी,
तेरी में, खुशियों को खोता रहा।।


दिल की थी, का क्या कसूर,
खुद ही तो वीरानियों के बीज बोता रहा।।


भरम है आँखों को, तेरे लौट आने का,
बस इस उम्मीद में संजोता रहा।।


तेरी बातों के खंज़र से ज़ख्मी है “प्रदीप”
को साँसों में पिरोता रहा।।