गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

करवट बदल-बदल के, कल शब गुजर गई





करवट बदल-बदल के, कल शब गुजर गई।
आई तुम्हारी याद फिर, न जाने किधर गई।।


तन्हाँ तड़पता रह गया, बेबस हमारा दिल,
दर पे तुम्हारे सेहरे की, खुशबू बिखर गई।।


मैं लुट गया हूँ चल के, मुहब्बत की राह पे,
वगरना जमाने भर की, किस्मत सुधर गई।।


आज तक मैं चला हूँ, बस उसूलों पे मगर,
आज भी कोई कसम, फिर से मुकर गई।।


कशमकश में मैं उठा, और देखा उस तरफ,
जिसकी जानिब आप ही, मेरी नज़र गई।।


हैरान हूँ मैं देखकर, घर के तमाम आईने,
हर आईने में क्यों तिरी, सूरत उभर गई।।


रात भर तो हो गई, लेकिन न आई लौटकर,
शायद "प्रदीप" रूठकर, अबकी सहर गई।।