गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

शेर-ए-प्रदीप : भाग 2

हमने ज़िन्दगी भी उनके नाम कर दी।
तमाम लोगों ने चर्चा शरेआम कर दी।
ये कैसी मुहब्बत है, ये कैसा इंसाफ है
कि चंद साँसें बची थीं, नीलाम कर दी।।


अपने वादों से खुद वो मुकरने लगा।
इश्क़ हद से मिरा जब गुजरने लगा।
जबसे रुख्सत हुई ज़िन्दगी से मिरी,
वो महकने लगी, मैं बिखरने लगा।।


ऐसा लगता है, अब न आयेगा।
यूँ ही ख्वाबों में, बस सतायेगा।
जिन्दगी हो गई एक मुश्किल है,
ग़म-ए-फुरकत सहा न जायेगा।।


जिंदगी भर तिरा लिहाज़ रखा है।
जितना कल था उतना आज रखा है।
कोई नज़र न उठे तिरे जानिब "प्रदीप"
इसलिए लबों को बेआवाज़ रखा है।।