रविवार, 26 फ़रवरी 2017

शेर-ए-प्रदीप : भाग ३

नफरत की दीवारें तोड़ कर आया हूँ।
रुखे ज़िन्दगी को मोड़ कर आया हूँ।
तुम्हे शायद ताउम्र हासिल नहीं हो,
मैं उतनी दौलत छोड़ कर आया हूँ।।


मंजूर है तो बता, न मंजूर है तो बता।
तुमसे इश्क़ करना कसूर है तो बता।
ओढ़ लूँगा पलभर में मौत की चादर,
गर यही उल्फ़त का दस्तूर है तो बता।।


मुद्दतें हो गईं मगर वो फ़साना याद है।
वो तेरा रूठ जाना वो मनाना याद है।
भुला दिये तमाम जमाने मगर फिर भी,
वो तेरे साथ गुजरा इक जमाना याद है।।


इश्क़ वो दरिया है जो ठहरता नहीं है।
इश्क़ वो रंग है जो उतरता नहीं है।
करीब से समझा है इश्क़ को "प्रदीप"
इश्क़ वो जख्म है जो भरता नहीं है।।


कभी तराने बदले तो कभी साज बदल गये।
कभी फितरत कभी उनके अंदाज़ बदल गये।
उस फ़साने की हकीकत कुछ ऐसी थी "प्रदीप"
कभी खुद तो कभी उनके हमराज़ बदल गये।।