सोमवार, 25 सितंबर 2017

ये घर है किराये का, इसका न ठिकाना है

क्या इसका गुमाँ करना, जब छोड़ के जाना है।
ये घर है किराये का, इसका न ठिकाना है।।

ये तन भी नहीं अपना, ये मन भी नहीं अपना,
कोई भी नहीं अपना, हर शख़्स बेगाना है।।

चाहा है अभी तक तो, बेदर्द ज़माने को,
बस दर्द से ही नाता, अब हमको निभाना है।।

तकदीर से क्या शिकवा, क्या ऐब मुकद्दर का,
जो बीत गये लम्हे, अब उनको भुलाना है।।

उम्मीद बनी जब से, तू मेरी मुहब्बत की,
तस्वीर तिरी हमदम, सीने में बसाना है।।

दोनों ही मुसाफ़िर हैं, इक प्यार के दरिया के,
मिलकर के ही कस्ती को, उस पार लगाना है।।

हसरत हैं' कई दिल में, है एक तमन्ना भी,
अब 'दीप' तिरा मकसद, रूठों को मनाना है।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

मानव और पशु


पशु मानव तो हैं भिन्न-भिन्न,
   फिर क्या दोनों में नाता है।
       मानव पशु पर पशु मानव पर,
          क्यों आश्रित होता जाता है।।
             पशु का गुण तो होता पशुता,
                 निष्ठा के साथ निभाता है।
                    पर मानव की मानवता पर,
                         क्यों प्रश्न चिह्न लग जाता है।।

क्यों दूर धर्म से क्षत्रिय है,
    क्यों ब्राह्मण पूजा भूल गया।
          क्यों शूद्र श्रेष्ठ बन बैठा है,
               क्यों बनिक आज प्रतिकूल गया।।
                    क्या यही कर्म है मानव का,
                         क्यों अत्याचार बढ़ाता है।
                             खुद भी मिल जाता मिट्टी में
                                औरों का नाम डुबाता है।।

मानव के भीतर मानवता,
  अब नहीं दिखाई देती है।
     पशु की चीखों की रातों को,
        आवाज सुनाई देती है।।
           यदि शत्रु शत्रुता दिखलाए,
             तो क्या अनुचित कर देता है।
               छल-कपट करे यदि मित्र कभी,
                  दु:ख हृदय विदारक देता है।।

पशु को दोषी कैसे कह दूँ,
   जिसकी विकसित है सोच नहीं,
      जब मानव को पशु बनने में,
         रत्ती भर है संकोच नहीं।।
            जिस मानव का पद-कमलों में,
              माधव के मन नहिं रमता है।
                वो मानव भी है पशु समान,
                   ऐसा ये 'दीप' समझता है।।