सोमवार, 25 सितंबर 2017

ये घर है किराये का, इसका न ठिकाना है

क्या इसका गुमाँ करना, जब छोड़ के जाना है।
ये घर है किराये का, इसका न ठिकाना है।।

ये तन भी नहीं अपना, ये मन भी नहीं अपना,
कोई भी नहीं अपना, हर शख़्स बेगाना है।।

चाहा है अभी तक तो, बेदर्द ज़माने को,
बस दर्द से ही नाता, अब हमको निभाना है।।

तकदीर से क्या शिकवा, क्या ऐब मुकद्दर का,
जो बीत गये लम्हे, अब उनको भुलाना है।।

उम्मीद बनी जब से, तू मेरी मुहब्बत की,
तस्वीर तिरी हमदम, सीने में बसाना है।।

दोनों ही मुसाफ़िर हैं, इक प्यार के दरिया के,
मिलकर के ही कस्ती को, उस पार लगाना है।।

हसरत हैं' कई दिल में, है एक तमन्ना भी,
अब 'दीप' तिरा मकसद, रूठों को मनाना है।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'