रविवार, 12 नवंबर 2017

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई

अँग्रेजों  ने रण में  जिससे,  इक  दिन  मुँह  की खाई थी।
वह   भारत   माता   की   बेटी,   रानी   लक्ष्मीबाई   थी।।

बचपन  से  ही  जिसने  बरछी  और  तलवार  उठाई थी।
जिसने अपना सब कुछ खोकर, माँ की लाज़ बचाई थी।।

बाँध  पीठ पर   सुत  को  जिसने, रण में धूम मचाई थी।
जिसके  शौर्य  पराक्रम  से  दुश्मन  सेना  चकराई  थी।।

रण  में  जिसने  दोनों  हाथों   से   तलवार   चलाई  थी।
रणचंडी  बनकर  दुश्मन  को, नानी  याद  दिलाई  थी।।

अरिमुण्डों  को  काट-काटकर, जिसने  नदी बहाई  थी।
खट्टे  दाँत  किये  दुश्मन  के,  ऐसी   मार   लगाई   थी।।

समय किसी का सगा न होता, समय ने दृष्टि घुमाई थी।
रानी   एक   शत्रु   बहुतेरे,   पड़ी   सामने   खाई   थी।।

हुए  वार  पर  वार  मगर,  रानी  न  तनिक घबराई  थी।
शायद  अंतिम  बार   लक्ष्मी  ने  तलवार    उठाई   थी।।

अरि  के  सीने  चीर-चीर  कर  जिसने चिता सजाई थी।
उसे  देख कर आँखों  से भी,  जलधारा  बह  आई थी।।

रानी  आज  नहीं  है  लेकिन,  याद  सभी को आई थी।
भस्म  चिता  की उठा सभी ने, अपने शीश लगाई थी।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'