मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

हुआ बबाल आज फिर, किसी बयान पर यहाँ

[बहर-ए-हजज़ मुसम्मन मक़बूज़]

1212 1212 1212 1212

नहीं  लगाम  लग  सकी  कभी जुबान पर यहाँ।
हुआ बबाल आज फिर, किसी बयान पर यहाँ।।

बड़े ज़ुनून में नज़र   उठी   कमान   पर   यहाँ।
हुआ  फ़साद  आज  आरती  अजान पर यहाँ।।

हुईं   निज़ामतें   रियायती  लगान  पर   यहाँ।
मगर  बना  रहा  उधार भी किसान पर यहाँ।।

हज़ार   लोग  सामने   खड़े    रहे  वहीं   मगर,
रकीब चोट कर गया उसी निशान  पर  यहाँ।।

ज़नाब पार   कर  सको बिसात  आपकी  नहीं,
नदी  हुजूर  आज   है  अभी उफान पर यहाँ।।

हजार कत्ल हो गये वहाँ ज़र-ओ-ज़मीन  पर,
हज़ार बार टूटकर   पड़ी  मकान  पर   यहाँ।।

न 'दीप' को रहा कभी मलाल हार का   किसी
नहीं फतेह गर कभी मिली इमान पर यहाँ।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'