शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

आज मुद्दत के बाद घर देखा

यार  को  आज भर  नज़र  देखा।
इश्क़ आँखों  में  पुरअसर देखा।।

उसकी नज़रों में इक  हुनर  देखा।
खुद से खुद को ही बेख़बर देखा।।

हमने क्या शाम क्या  सहर  देखा।
ख़्वाब में उनको रात  भर  देखा।।

उम्र भर  फिर  न  लौटकर  देखा।
उसने देखा तो किस कदर देखा।।

जिसने समझी न वक़्त की कीमत,
घूमता  उसको  दर-ब-दर  देखा।।

तुम  ही आये  नहीं  कभी  मिलने,
रास्ता   हमने   उम्र   भर   देखा।।

'दीप'  गुरबत  का  खा़मियाजा  है,
आज  मुद्दत  के  बाद  घर  देखा।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

बुधवार, 7 अगस्त 2019

नया भारत बनाना है

नया जब दौर है तो फिर, नया ज़ज़्बा दिखाना है।
विकासक नीतियों को अब हमें आगे बढ़ाना है।
गगन में गूँज भारत की‌, सुनाई दे ज़माने को,
नयी तकनीक से हमको नया भारत बनाना है।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

बेख़बर क्यों हो गया तू, हो गया अनजान क्यों

बेखब़र क्यों हो गया तू? हो गया अनजान क्यों?
ज़िंदगी तुझ पर ये दिल भी, कर गया कुरबान क्यों?

बेबसी कुछ भी नहीं थी, चाहतों के दरमियाँ,
चार दिन का बन गया फिर, तू मिरा महमान क्यों?

पूछती है हाल अब तो, मुझसे' मेरी रहगुज़र,
हो गई है, आजकल ये, ज़िन्दगी वीरान क्यों?

बोझ सी लगने लगी है, जिंदगी कुछ रोज़ से,
कोई' ऐसा मुझ पे' जाने, कर गया अहसान क्यों?

बन गई गुरबत भी दुश्मन, ज़िन्दगी की राह में,
ख्वाहिशें क्यों मिट गईं हैं? लुट गये अरमान क्यों?

कामयाबी की ये मंज़िल, दूर कितनी हो गई,
रास्ता मिलता नहीं कोई मुझे आसान क्यों?

'दीप' तन्हाई मयस्सर, हो सकी कर के वफ़ा,
जिंदगी हर मोड़ पर अब, लग रही सुनसान क्यों?

-प्रदीप कुमार पाण्डेय

सोमवार, 5 अगस्त 2019

आज उसी बेदर्दी का दिल और किसी पर आया है



जिसकी खातिर मैंने अपना चैन सुकून गँवाया है।
आज उसी बेदर्दी का दिल और किसी पर आया है।।

उसकी बेपरवाही से हम, इक दूजे से दूर हुए।
जीवन भर के सपने सारे, पल में चकनाचूर हुए।।
मेरा साथ छोड़ कर उसने, गैर का साथ निभाया है।
आज उसी बेदर्दी का दिल और किसी पर आया है।।

अक्सर मेरे दिल में चुभती रहती हैं उसकी बातें।
याद में उसकी रो-रो कर, कटती हैं अब तो रातें।।
मेरे दिल की उम्मीदों को, दिल में ही दफ़नाया है।
आज उसी बेदर्दी का दिल और किसी पर आया है।।

प्यार को मेरे प्यार न समझा, चाहत को ठुकरा डाला।
जाते-जाते थमा गया वो, अपनी यादों का प्याला।।
ग़म की आग को उसने मेरे सीने में सुलगाया है।
आज उसी बेदर्दी का दिल और किसी पर आया है।।

उसके बिन ये नदी, बगीचे मुझे न बिल्कुल भाते हैं।
एक बार तो आ जाए वह, मेरे गीत बुलाते हैं।
मेरे अश्कों पर भी उसने, थोड़ा रहम न खाया है।
आज उसी बेदर्दी का दिल और किसी पर आया है।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

शनिवार, 3 अगस्त 2019

मुस्कान-ए-मुहब्बत है

है प्यार भरा दिल में, मुस्कान-ए-मुहब्बत है।
दिल तुमसे लगा जाकर, एहसान-ए-मुहब्बत है।।

जो दिल में अभी तक है, बेनाम भले कह लो,
उम्मीद मे'रे दिल की, उनवान-ए-मुहब्बत है।।

बरसात के' मौसम में, आ जाना' कभी दिलवर,
ये मेरी' तमन्ना है, अरमान-ए-मुहब्बत है।।

हैं फ़लक ज़मीं दोनों, इक साथ ज़माने से,
दिलकश ये' नमूना है, गैहान-ए-मुहब्बत है।।

हो जाये' फ़रेबी गर, ये दुनिया' मिरे दिलवर,
हरदम ही' वफ़ा करना, फ़र्मान-ए-मुहब्बत है।।

ज़िंदा है' वफ़ा तुमसे, तुम नूर-ए-ज़माना हो,
ये तेरी' अदा दिलवर, ईमान-ए-मुहब्बत है।।

सींचा है' मुहब्बत को, अश्क़ों से अगर उसने,
वो शख़्स ज़माने में, इक बान-ए-मुहब्बत है।।

मुश्किल से' जिया अब तक, बेदर्द ज़माने में,
आखिर में समझ आया, दिल ज़ान-ए-मुहब्बत है।।

इक मज़नू' था' इक राँझा, बेताब दी'वाने थे,
अब दीप ज़माने में, दीवान-ए-मुहब्बत है।।


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शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

ज़ख़्म दिल के क्या दिखाना



ज़ख़्म दिल के क्या दिखाना, छोड़ अब जाने भी दे।
वाकया  ये  है  पुराना,  छोड़  अब  जाने   भी   दे।।

कौन जाने कब कहाँ पर उनसे अब होगा मिलन,
हो गया बिछड़े ज़माना, छोड़ अब जाने भी दे।।

आपकी मिट्टी की काया, मिट्टी में मिल जाएगी,
एक दिन सबको है जाना, छोड़ अब जाने भी दे।

फ़िक्र है किसकी तुझे, तुझको किसका ख़ौफ़ है,
व्यर्थ का झूठा बहाना छोड़  अब  जाने  भी  दे।।

कब तलक करते रहोगे इस तरह गुमराह तुम,
हर जगह सिक्का जमाना छोड़ अब जाने भी दे।

कैसे साबित कर सकोगे आज खुद को बेगुनाह,
है बहुत ज़ालिम ज़माना, छोड़ अब जाने भी दे।।

'दीप'  ने  मंज़र  तबाही  के  कई  देखे  यहाँ,
इसलिए अब रहम खाना, छोड़ अब जाने भी दे।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

तुम भले ही ख़ुशी की दुआ मत करो




तुम भले ही ख़ुशी की दुआ मत करो।
मेरे ज़ख़्मों को लेकिन हवा मत करो।।

एक दो पल  की  दूरी  तो  मंज़ूर  है,
उम्र भर के लिए तो जुदा मत करो।।

चीर कर दिल निकल जाए जो तीर सी,
बात  ऐसी  कभी  भी  कहा मत करो।।

अपने वादों पे कायम न जो रह सके,
ऐसे  इंसान‌  का  आसरा  मत करो।।

ज़ख़्म  पर  ज़ख़्म  मिलते  रहेंगे  यहाँ
आप अश्क़ों से इनको सिला मत करो।।

इसी ग़ज़ल के सिलसिले में दो अश्आर भी जल्द आप सभी की खिदमत में पेश करूँगा। उम्मीद करता हूँ कि आप सभी को ये चंद अश्आर पसंद आयेंगे और आप इस नाचीज़ को अपनी दुआओं से नवाजेंगे।

बुधवार, 31 जुलाई 2019

वो सच्चा प्यार था धोखा नहीं था

*1222 1222 122*

तुम्हीं ने खुद जिसे समझा नहीं था।
वो सच्चा प्यार था धोखा नहीं था।।

भरी महफ़िल में ऐसा कौन था जो,
तेरे  दीदार  का  प्यासा  नहीं  था।।

तुम्हारे  चहरे  की  ही  रोशनी थी,
ज़मीं पर चाँद तो उतरा नहीं था।।

जहाँ में वक़्त से वाक़िफ़ सभी थे,
मेरे ही साथ तो गुजरा  नहीं  था।।

तेरी   यादें  गवाही  दे  रही  थीं,
कई रातों से मैं सोया नहीं था।।

तेरी तो बेदिली कायम रही थी,
मेरा ही दिल था जो टूटा नहीं था।।

वजूद अपना बहुत ढूँढ़ा जहाँ में,
बस अपने आप में ढूँढ़ा नहीं था।।

जुदा तुम 'दीप' से तो हो गए पर,
तुम्हारे बिन भी मैं तन्हा नहीं  था।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

तूने ओ दिलरुबा, आज यूं मुस्कुरा

दिलरुबा, आज यूँ मुस्कुरा, हाल दिल का सुनाया मज़ा आ गया।
मुझसे नज़रें मिला, साकिया की तरह, ज़ाम ऐसा पिलाया मज़ा आ गया।।

दरमियान-ए-ज़माँ तूने ओ जान-ए-जाँ, मुस्कुराते हुए प्यारे अंदाज़ में,
उस महकती हुई महफ़िल-ए-इश्क़ में, हाथ मुझको थमाया मज़ा आ गया।।

पल सुहाने लगे, जब गले थे मिले, भूलकर ये जहाँ, खो गये थे कहाँ,
रात वो थी हसीं, जब मेरे हमनशीं, हाथ तुमने लगाया मज़ा आ गया।।

वो सुहानी फ़िजा, काली' काली घटा, वक्त रंगीन था, हम भी' मदहोश थे,
दौर-ए-बारिश में ओ हमसफ़र, हमनशीं, साथ में जब नहाया मज़ा आ गया।।

ऐ मिरे रहगुज़र, दिलनशीं रात भर, साथ रहकर किया ऐसा दिल पे असर,
'दीप' रंगीनियों से भरी रात में ख्वाब़ ऐसा दिखाया मज़ा आ गया।।


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रविवार, 21 जुलाई 2019

वफ़ादार होकर वफ़ा कर न पाए

वफ़ादार  होकर  वफ़ा  कर   न   पाए।
मगर उनको दिल से जुदा कर न पाए।।

हमारी  तो  जाँ   माँग  ली   है  उन्होंने,
जिन्हें चाहकर भी मना  कर न  पाए।।

हज़ारों   दुआएँ   खुदा   से   हैं  माँगी,
मगर खुदकुशी की दुआ कर न पाए।।

तमन्ना   तुम्हारे   ही   दीदार   की  थी,
तुम्हारा पता ही  पता  कर  न  पाए।।

जहाँ में हजारों  हुनर  सीख  कर  भी,
महज़ हम किसी से दग़ा कर न पाए।।

खता 'दीप' की सिर्फ  इतनी  रही  है,
उन्हें अपनी सांसें अता कर न पाए।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'