रविवार, 7 अक्तूबर 2018

ज़रा प्यार से मुस्कुरा कर तो देखो

*[बहर-ए-मुत्कारिब मुसम्मन सालिम]*
*[ 122  122  122  122 ]*

ज़रा  प्यार  से  मुस्कुरा  कर  तो  देखो।।
करीब और थोड़ा सा आ कर तो  देखो।।

तेरा बन के  रह  जाऊँगा  उम्र भर  तक,
कभी मुझको अपना बना कर तो देखो।।

रवायत      रवायत      रहेगी     हमेशा,
हथेली  पे  सरसों  उगा कर  तो  देखो।।

कई  चाँद  पड़   जाएँगे   आज   फ़ीके,
ज़रा रुख़ से पर्दा उठा  कर  तो  देखो।।

चले   आएँगे   एक   आवाज़   में   ही,
कभी आप हमको बुला कर तो देखो।।

हमेशा    तुम्हें     याद     आते     रहेंगे,
हमें  भूल  से  भी  भुला कर तो देखो।।

वो  महफ़िल  में  आँसू   बहाने   लगेंगे,
ग़ज़ल 'दीप' की गुनगुना कर तो देखो।।


-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

शनिवार, 6 अक्तूबर 2018

किसी के मुक़ाबिल झुका मैं नहीं हूँ...


*[बहर-ए-मुत्कारिब मुसम्मन सालिम]*
*[122 122 122 122]*

किसी  के  मुक़ाबिल  झुका मैं नहीं  हूँ।
मगर   हाँ!  ख़ुदा से बड़ा  मैं  नहीं  हूँ।।

किसी  के  लिए  गर  मरा  भी नहीं   तो,
फ़क़त अपनी ख़ातिर जिया मैं नहीं हूँ।।

उसूल  एक  बस  जिंदगी  का  रहा है,
ग़लत  रास्ते  पर  चला  मैं   नहीं   हूँ।।

वफ़ा  कर  न  पाना   मेरी  बेवशी  थी,
हक़ीक़त  में  तो  बेवफ़ा  मैं  नहीं  हूँ।।

सताती रही जो  दिवानों  के  दिल को,
किसी की वो नाज़ुक अदा मैं नहीं हूँ।।

शराफ़त  से  जीना ही  सीखा  है  मैंने,
सियासी  कोई  वाकया  मैं   नहीं  हूँ।।

भले  दूर  है  ज़ुर्म  से  'दीप'  अब तक,
मगर दूध  का  भी  धुला  मैं  नहीं  हूँ।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

प्रथम प्रार्थना प्रतिदिन प्रभु से...

कविराज तरुण जी 'सक्षम'

अलंकार : छटा अनुप्रास एवं उपमा

शब्दों में मुश्किल कह पाना है क्या सम्मान आपका है।
हम तारों के बीच चंद्रमा का स्थान आपका है।
प्रेरक प्रखर प्रयास आपका, सर्वविदित है, उत्तम है,
आप हमारे साथ चले हैं ये एहसान आपका है।।

प्रथम प्रार्थना प्रतिदिन प्रभु से ये करबद्ध हमारी है।
कलम कामना मंगल करने को प्रतिबद्ध हमारी है।
जीवन ज्योति जगे जब तक जग में जमुना और गंगा हैं,
नव सृजन करें, नित हवन करें, प्रणती अभिबद्ध हमारी है।।

अक्षम को सक्षम करने का जो ढंग आपने सीखा है।
उपमा का मिलना मुश्किल है, भव सा जग में न सरीखा है।
बस केवल एक निवेदन ही करता "प्रदीप" है ईश्वर से,
अतिशीघ्र उसे पूरा कर दे, जो स्वप्न आपको दीखा है।।

प्रदीप कुमार पाण्डेय

वफ़ादार को ही बताया गया..

ग़ज़ल गुंजन साहित्य संगम संस्थान द्वारा दि० १७ जून २०१७ को आयोजित ग़ज़ल सृजन प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान प्राप्त करने पर संस्थान का कोटि-कोटि धन्यवाद!

बह्र-ए-मुत्कारिब मुसम्मन मक्सूर

फऊलुन x 3 + मुफा

122  122  122  12

वफ़ादार को ही सताया गया।
यहाँ कातिलों को बचाया गया।।

सियासी जमाना बदस्तूर है,
हमेशा वही रंज़ खाया गया।।

बज़ाहिर मुसाफिर अकेला सही,
मिरा हाल कैसा सुनाया गया।।

ग़रीबी हमेशा रही है जवाँ
बुढ़ापा अमीरी पे' लाया गया।।

उसे भी वही तो रहा है गुमाँ,
कि जैसा उसे जो बताया गया।।

कसूरों, फ़रेबों, गुनाहों तुम्हे,
कहाँ से कहाँ तक छुपाया गया।।

नहीं और जीने का' हक चाहिए,
नशेमन हमारा जलाया गया।।

प्रदीप कुमार पाण्डेय

नित प्रातः अरुण हम अरुण सदा....

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*आज का विषय : कृतित्व और व्यक्तित्व
(आद० अरुण श्रीवास्तव 'अर्णव' जी)

विधा: मुक्त

अलंकार: अनुप्रास, यमक और उपमा।

नित प्रात अरुण सम अरुण सदा,
अपना प्रकाश फैलाते हैं।
संगम के सभी सृजनकारों का,
प्रतिपल हर्ष बढ़ाते हैं।
कितने उपकार किए अब तक,
ये कैसे आज बखान करूं,
सादर साभारोसानुराग,
दोनों ही कर जुड़ जाते हैं।।

जब तक हैं सूरज चांद यहां,
जब तक सावन और फाग रहे।
जब तक केसर की क्यारी हैं,
जब तक आमों के बाग रहे।
आशीर्वचन कहते रहना,
जब तक है संगम की छाया,
गंगा है, जब तक जमुना है,
मुझ पर भारी अनुराग रहे।।

है यही कामना ईश्वर से,
संसर्गों का आयाम करे।
सतपथ पर चले लेखनी और,
ऐसे ही नित व्यायाम करे।
मन में सबके छा जाओ फिर,
अनुसरण आपका हो जग में,
जीवन में मिले सफलता भी,
जग में बहुचर्चित नाम करे।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

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अमन की चैन की खातिर....

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*ईद*

बह्र-ए-हज़ज़ मफ़रद मुसम्मन सालिम

मुफ़ाईलुन x ४

१२२२  १२२२  १२२२ १२२२

उठें गर हाथ सज़दे में तो'बस दिल से दुआ आये।
अमन की चैन की खातिर जमाने की सदा आये।।

नबी से ओ खुदा से है यही बस इल्तिजा मेरी,
खुशी किस्मत में' हो सबके न हिस्से में जफ़ा आये।।

जमाने से नहीं कोई गिला मेरा मगर फिर भी,
मेरी हसरत जमाने को जमाने की अदा आये।।

मुझे मकबूलियत अपनी नहीं प्यारी कभी भी थी,
गरीबों को मिले रोटी अमीरों को मज़ा आये।।

मुबारक ईद हो सबको यही दिल से दुआ मेरी,
तराने 'दीप' के सुनकर लगा शायद खुदा आये।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

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वतन की राह में जिसने लहू बहाया है...

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बह्र-ए-मुज़तस मुसम्मन मखबून महज़ूफ

मुफ़ाइलुन + फ़यलातुन  + मुफ़ाइलुन +  फ़ेलुन

१२१२  ११२२  १२१२  २२

वतन की'राह में' जिसने लहू बहाया है।
अमरशहीदों में' उसका ही' नाम आया है।।

रहेगा' फ़ख्र वतन को भी' सरफ़रोशों पे,
खुशी खुशी ही' क़ज़ा को गले लगाया है।।

क़मर सितारों' की करते वो' जुस्तजू भी क्या,
जिन्होंने' दिल में' वतन को ही' जब बसाया है।।

खुदा गवाह जुदा हो गए जो' अपनों से,
शहादतों के' सबब अश्क़ ना बहाया है।।

कभी जो' आया' है' ख़त सरहदों से' साजन का,
उसी ने आज यहां हाले' दिल सुनाया है।।

सदा रहेगा'वतन कर्ज़दार उसका भी,
फ़ना वतन पे' हुआ जिसका लाल जाया है।।

लिखूं मैं' दर्द भी' नादान बेगुनाहों का,
उठा है' सर से' पिता का भी' जिनके साया है।।

करें सबर तो' बता किस कदर करे वो भी,
ज़नाजा बाप के सानों ने' जब उठाया है।।

लगी थी' भीड़ ओ' खामोशियां भी' छाईं थीं,
वहां भी' 'दीप' का' दिल बेकरार पाया है।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

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मेरे दुश्मनों की मज़ाल है...

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*बह्र-ए-कामिल मुसम्मन सालिम*

*मुतफ़ाइलुन * ४*
*११२१२ x ४*

ये' मिसाल है, मिरे' इश्क़ की, ये' मिरी वफ़ा का' कमाल है।
वो' खुशी खुशी, है' गले मिला, न गिला न कोई' मलाल है।।

वो' जिसे फ़लक की' तमन्ना' थी, है' चला ज़मीं से' वो' आज तो,
है' दुआ मिलें हैं' जो' चाहतें के नसीब राह मुहाल है।

किसी' बेवफ़ा से' नहीं गिला, जिसे' चाहकर भी' तो' ग़म मिला,
कभी' हाले' दिल भी' बयां करो, तू' खुशी की' जिंदा मिसाल है।।

मुझे' बस खुदा की' दुआ मिले, हो' करम मिरे भी' हबीब का,
मिरे' सामने जो' टिके कहां, मिरे' दुश्मनों की' मज़ाल है।।

मिरे' कातिलों को' सज़ा नहीं, है' गुनाह किसका' बता यही,
है' कहां अमन है' कहां चमन, यहां' सियासतों का' ये' हाल है।।

बड़ी' दूर चला मैं' जहान में, मुझे' मिला न कोई' भी' बावफ़ा,
को'ई' बता सही, कभी' 'दीप' को, ये' मचा हुआ जो' बबाल है।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

मेरा इश्क़ भी बेमिसाल है...

मेरी एक ग़ज़ल

११२१२  ११२१२  ११२१२  ११२१२

है' मिरा फ़साना' मिरी है' बज़्म वो' सिर्फ़ यूं ही' तो' गा रहे।
वो' जिन्हें था' आना' वो' आ गये, वो' जिन्हें था' जाना' वो' जा रहे।।

है' अज़ीब बात बड़ी बहुत, के' मिटा दिये हैं' गये निशाँ,
के' जिन्हें नहीं है' खबर भी' खुद की' मुझे तो' वो भी' सिखा रहे।।

है' ये' इल्तिजा भी' मिरी खुदा, तू' रहम करे, तू' करम करे,
मिरे' दोस्तों की' खुशी रहे, ओ' सलामती की' दुआ रहे।।

मुझे' लौट कर वो' मिला नहीं, जो' यहां गया था' मैं' छोड़कर,
मिरी' बदनसीबी' बनी रही, मुझे' लोग अब भी' सता रहे।।

मिरा' इश्क़ भी बे' मिसाल है, बे' नकाब है, है' बे' इंतहा,
यही' दीप की हैं' गुज़ारिशें, जो' बना है' यूं ही' बना रहे।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

मानवता - कहानी

*लघुकथा / मानवता*

शाम के ७ बज रहे थे। प्रतिदिन की भाँति मैं टहलते हुए सड़क के किनारे-किनारे जा रहा था। सहसा एक हृदय को विदीर्ण करने वाली ध्वनि कानों तक पहुंचती है। देखा तो सड़क के किनारे कुछ लोग एकत्रित हैं, शायद किसी दुर्घटना की संभावना प्रतीत हुई। मैं भाग कर भीड़ के पास पहुचा। मेरा अनुमान सही निकला था। एक दुर्घटना हुई थी। दुर्घटना में मोती बुरी तरह घायल हो चुका था और जोर-जोर से करुण-क्रंदन कर रहा था।

दरअसल ये दुर्घटना एक कार से हुई थी, कार का चालक संभवतः मद्यपान किया हुआ प्रतीत हो रहा था। कार में बैठे अन्य लोग भी संभवतः मद्यपान किते हुए थे। मोती को देखकर मेरी आंखें भर गई थीं। कार सवार व्यक्तियों को देखकर प्रतीत हो रहा था कि किसी धनी परिवार से उनका संबंध है। मेरा मन आहत हो चुका था, रह रहकर मुझे सभी पर क्रोध आ रहा था जो खड़े-खड़े किसी की असहाय स्थिति की चर्चा किए जा रहे थे।

अचानक मेरी नज़र राघव पर गयी, जो पिछले कुछ दिनों से मेरे ही घर के पास आकर रहने लगे थे। स्वभाव से बहुत ही शांत थे, ईश्वर की पूजा पाठ में अनुराग होने से मेरी - उनकी मित्रता बहुत शीघ्र ही हो गयी थी। उन्हें देखकर मेरा साहस बढ़ा और मैंने उन्हें आवाज दी। सहसा किसी का ध्यान मेरी ओर तो किसी का ध्यान राघव की ओर आकृष्ट हो गया। सभी स्तब्धता के साथ हमें देख रहे थे। राघव के पास एक पुराना स्कूटर था जो उन्होंने दो माह पूर्व ही ५००० रु देकर गुप्ता साहब से खरीदा था।

हमने मोती को उठाया और स्कूटर पर लेकर पशु चिकित्सालय की ओर चल पड़े। पशु चिकित्सालय थोड़ा दूर होने से लगभग एक घंटे के बाद हम चिकित्सालय पहुंचे, रात का ९:१५ बज चुके थे, चिकित्सालय बंद था। मैं फिर निराशा की रजनी में सोने लगा। तभी अचानक किसी के खाँसने की आवाज आई। शायद मेरी निराशा की  रात की सुबह हो गई थी। पास जाकर देखा तो एक परिवार भोजन कर रहा था। परिवार में कुल ७ सदस्य थे। पति-पत्नी, उनका १ पुत्र और ४ पुत्रियां। मैंने आवाज़ दी तो वो सज्जन व्यक्ति घर से बाहर आए, पता करने पर बताया कि वह चिकित्सालय के चौकीदार हैं। मैंने उन्हें घटना के बारे में अवगत कराया। पूछने पर उसने डॉ ० साहब का पता बताया। उसे धन्यवाद कहकर मैंने राघव को मोती के पास वहीं छोड़ा और स्वयं स्कूटर से डाक्टर साहब के घर की तरफ चल पड़ा।

डॉ ० साहब के घर पहुंच कर मैंने डोरबेल बजायी, अंदर से श्रीमती जी बाहर आयीं। मैंने नमस्ते! कहकर डाक्टर साहब के बारे में पूछा तो पता चला कि वो अपने किसी मित्र के घर गये हैं। मैंने श्रीमती जी से उनकी चलभाषा संख्या लेकर संपर्क किया तो प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। मुझसे घटना की जानकारी सुनकर शायद डाक्टर साहब ने चिकित्सालय जाने के लिए अपनी स्वीकृति दे दी थी।

मैं स्कूटर लेकर तक्षशिला कोलोनी पहुंचा और डाक्टर साहब को लेकर पशु चिकित्सालय की ओर चल दिया। रास्ते में मैंने उनका शुभनाम पूछा तो उन्होंने करुणासागर बताया। मुझे अपार हर्ष हो रहा था *यथा नाम तथा गुणा:*। करुणासागर साक्षात करुणा की मूर्ति थे। रात के १०: ४५ बज रहे थे और हम स्कूटर से चिकित्सालय की ओर तेजी से चले जा रहे थे।

चिकित्सालय पहुंच कर करुणासागर जी ने चौकीदार को चिकित्सालय खोलने के लिए कहा। चौकीदार ने चिकित्सालय खोला। डॉ ० करुणासागर ने मरहम पट्टी की। चोट अधिक गहरी होने से दो दिन में फिर आने को कहा।

दो दिन बाद हम फिर मोती को लेकर चिकित्सालय पहुंच गये। इस बार राघव को किसी कारण से अपने पैतृक गांव जाना पड़ गया था इसलिए मेरे साथ मेरे मित्र करन आये थे।

दवाई देकर डा० करुणासागर ने फिर एक सप्ताह में आने को कहा। इस प्रकार लगभग ३ माह के बाद मोती के घाव पूरी तरह से भर गये, मगर पिछली दोनों टांगों के टूट जाने से मोती सरक-सरक कर चल तो सकता है, परन्तु भाग नहीं सकता, दौड़ नहीं सकता।

तब से लेकर आज तक मोती मेरे यहां ही रहता है, पड़ोसी लोगों का दुलार उसे उसके दर्द को कम करने की भरपूर कोशिश करता है।।

मोती आज मेरे लिए पालतू जानवर से भी ज्यादा प्यारा है, कारण उसकी बेबसी, उसकी लाचारी और उसका असहायपन।

लेखक -प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

नोट: ये लघुकथा पूर्णतया काल्पनिक है, किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान अथवा समय से इसका कोई लेना देना नहीं है। प्रतिलिपि अधिकार अधिनियम के तहत आप इसे शेयर कर सकते हैं या बिना तोड़-मरोड़ किये लेखक के नाम के साथ कहीं कापी-पेस्ट कर सकते हैं।

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

गुरु

गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर।
गुरु साक्षात् परमं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।।

अर्थात् गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही शंकर है, गुरु ही साक्षात परब्रह्म है, ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं।

आज गुरु पूर्णिमा है। गुरु के प्रति आस्था और श्रद्धा से समर्पण का दिवस है। गुरु हमें जीवन पर्यन्त शिक्षा प्रदान करते हैं, अच्छे-बुरे का बोध कराते हैं। गुरु इसके बदले में हमसे कभी कुछ लेने की अभिलाषा नहीं रखते, क्योंकि गुरु देने वाले होते हैं, वो हमसे कभी कुछ मांगते नहीं हैं। गुरु के भावों को कुछ पंक्तियों में इस प्रकार समाहित किया जा सकता है कि,

गुरु पारसमणि के समान होता है, जो लोहे को सोना बनाने का कार्य करता है। गुरु के सानिध्य में जो आया उसका कल्याण हुआ। गोस्वामी तुलसीदास जी विरचित श्रीरामचरितमानस के अनुसार,

गुरु बिनु भवनिधि तरइ न कोई।
जो बिरंचि शंकर सम होई।।

श्रीरामचरितमानस में इस बात का उल्लेख किया गया है कि गुरु के बिना इस संसार सागर को पार कर पाना असम्भव है, अर्थात् गुरु के बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है, फिर
चाहे वह, ब्रह्मा जी या शंकर जी ही क्यों नहीं हों। गुरु का स्थान सर्वोपरि माना गया है। हमारा गुरु कोई भी हो सकता है, ये आवश्यक नहीं है कि वह टेलीविजन पर आने वाला कोई प्रख्यात व्यक्ति हो, साधारण व्यक्ति भी हमारा गुरु हो सकता है, अर्थात् जो हमारा मार्गदर्शन कर हमें सत्पथ पर चलने के लिए प्रेरित करे वही गुरु है। सबसे पहले हमारी गुरु हमारी मां होती है, जो हमें उंगली पकड़कर चलना सिखाती है, अच्छे-बुरे का बोध कराती है, और इस चराचर की विभिन्न वस्तुओं से अवगत कराती है। मां सर्वथा पूज्यनीय है। गुरु की आस्था और विश्वास पर कबीरदास​जी ने कुछ ऐसे कहा है कि,

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद जी बताय।।

अर्थात् बाबा कबीरदास जी कहते हैं कि, गुरु और ईश्वर दोनों ही सामने हैं, असमंजस की घड़ी है कि प्रथम प्रणाम किसको करना है, तो बाबा कबीरदास जी ने स्पष्ट किया है कि ये गुरु का हम पर अहसान है कि हमें ईश्वर की प्राप्ति हुई है, इसलिए गुरु प्रथम प्रणाम के योग्य है।

बाबा कबीरदास जी और आगे गुरु की महिमा काम वर्णन करते हुए कहते हैं कि,

सात समंदर मसि करूं, लेखन सब वनराय।
सब धरती कागज करूं, गुरु गुण लिखा न जाय।।

जो लोग कहते हैं कि हम तो मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च में जाते हैं तो उन्हें गुरु की क्या आवश्यकता है तो उनके लिए भी हमारे पास उत्तर है,

राम कृष्ण से को बड़े, तिंहू ने गुरु कीन्ह।
तीन लोक के नायका, गुरु आगे आधीन।।

अर्थात् भगवान श्रीराम चंद्र जी और श्री कृष्ण जी से कौन बड़ा है, उन्होंने भी गुरु बनाया, तीनों लोकों के स्वामी गुरु के प्रति नतमस्तक हैं, मानव जाति के लिए एक आदर्श बनकर, एक प्रमाण बनकर, एक उदाहरण बनकर।

गुरु के उपकारों का उल्लेख कुछ इस श्लोक में दृष्टव्य है,

अखंड मंडलाकारं व्याप्तं एन चराचरं।
तय्पदं दर्शिनं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

अर्थात् संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त जगत नियंता ईश्वरीय शक्ति का, अन्तर्घट में ही दर्शन करा देने वाले गुरु को मैं बारम्बार प्रणाम करता हूं।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

चलो स्कूल चलें चलें....

*शीर्षक - चलो स्कूल चलें*

हमें स्वीकार शिक्षा है,
जगत आधार शिक्षा है,
मिटाने को तिमिर उर से,
बनी तलवार शिक्षा है।
शिक्षा की इस अभिलाषा में,
व्यवधानों को भूल चलें।
चलो स्कूल चलें।।

दिया सन्मार्ग शिक्षा ने,
किया दिग्दर्श शिक्षा ने,
सदा सबका सहारा बन,
दिया प्रतिदर्श शिक्षा ने।
सदाचार के प्रतिपालक बन
हरने को​ हिय शूल चलें।
चलो स्कूल चलें।।

दिलाती मान शिक्षा है,
सिखाती सम्मान शिक्षा है।
मधुर मुखरित महानायक,
बढाती आन शिक्षा है।
यही  'दीप' कामना निशिदिन
प्रभु से कर अनुकूल चलें।
चलो स्कूल चलें।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

दिलों में मगर ख़ौफ़ सा है...

ज़माने का' मेला लगा​ है।
दिलों में मगर खौफ़ सा है।।

हमीं से मिला है अभी तक,
ज़मींदार कोई नया है।।

दिखा दीं हदें उसने' अपनी,
उसे अब न कोई हया है।।

मिरा दिल पिघलते पिघलते,
वजूदो अदम खो चुका है।।

तुम्हारा हुआ जबसे' आना,
मिरा दिल तुम्हारा हुआ है।

मुझे एक दिन याद आया,
बशर छोड़कर जो गया है।।

खुशी ही मिली 'दीप' को गर
किसी का सहारा बना है।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

सितमगर सताता रहेगा....

सितमगर सताता रहेगा।
मगर मुस्कुराता रहेगा।।

मिलेगी उसे भी सज़ा जो,
किसी को रुलाता रहेगा।।

हमें छोड़कर वो गया है,
मगर याद आता रहेगा।।

कहानी पुरानी लिखी वो,
सभी को सुनाता रहेगा।।

उसे फिर कहीं देख आया,
जहां को बताता रहेगा।।

मुझे हाल उसका सुनाकर,
निगाहें चुराता रहेगा।।

मिरा आसरा आसरा ही,
वफ़ा का दिलाता रहेगा।

मुलाकात की इल्तिजा है,
मगर वो छुपाता रहेगा।।

मुनासिब नहीं नींद होती,
जगाकर सुलाता रहेगा।।

अभी 'दीप' को ख्याल उसका,
सुलाकर जगाता रहेगा।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

ग़ज़ल गीत गाता रहूँगा.....

नये सुर सजाता  रहूंगा।
ग़ज़ल गीत गाता रहूंगा।।

मुझे रात भर तुम जगाना,
तुम्हें मैं जगाता रहूंगा।।

भरी बज़्म में मैं हमेशा,
सभी को हंसाता रहूंगा।।

कभी रूठ कर तुम गये तो,
तुम्हीं को मनाता रहूंगा।।

मकाँ रेत का ही मिरा मैं,
बनाकर मिटाता रहूंगा।

मुझे नाज़ है हमनसीं पे,
जहाँ को बताता रहूंगा।।

लगी आग है तनबदन में,
इसी को बुझाता रहूंगा।।

मिला 'दीप' जो प्यार दिल का,
दिलों पे लुटाता रहूंगा।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

सारा ज़माना कह रहा था....

ज़िंदादिली मेरी मुझे, तो कर गई खुशहाल है।
सारा जमाना कह रहा था, जिंदगी बदहाल है।।

मुश्किल हुई, आसान अब, ख्वाहिश सजीं ओ ख्वाब भी,
हालात मेरे साथ हैं, कैसे कहूं क्या हाल है।।

अंज़ाम की परवाह भी करती नहीं दीवानगी,
दिल तोड़ने वालों से' दिल, वाकिफ़ हुआ फ़िलहाल है।।

था मय मिला मीना मिली सागर मिला साकी नहीं,
साकी बिना पीना नहीं सब सामने जे़हाल है।।

बाआसरा ये ज़िन्दगी अब तक गुजारी 'दीप' ने,
जबसे मिला आकर मुझे वो फिर हुआ बेहाल है।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

जीना नहीं तेरे बिना....

बहर- २२१२ २२१२ २२१२ २२१२

जीना नहीं तेरे बिना, तेरे बिना मरना नहीं।
तेरे बिना मेरे सनम कुछ भी मुझे कहना नहीं।।

महफ़िल मिली, साहिल मिला, सब कुछ मुझे हासिल हुआ,
जो तू नहीं, तो कुछ नहीं, तेरे बिना रहना नहीं।।

हालात ने मेरे मुझे गुरबत में ला के रख दिया,
अब तक मुहाफ़िज था मिरा, अब आसरा रखना नहीं।।

मुझको वफ़ा करके मिला क्या बेखबर इतना बता,
करके रहम, इसको बुझा, इस आग में जलना नहीं।।

है ज़िन्दगी क्या चीज़ ये हमने नहीं जाना कभी,
तेरे सिवा अब और कुछ ख्वाहिश मुझे करना नहीं।।

तेरे सहारे जी रहा था जिंदगी तू थी मिरी,
अब 'दीप' बिन तेरे फ़कत साँसें मुझे गिनना नहीं।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

मुक्तक भाग -२

१.
किसी अपने की चाहत ने, बेगाना मुझको कर डाला।
फ़साने का नया उसने निशाना मुझको कर डाला।
असर तहरीर का मेरी हुआ उस पर नहीं लेकिन,
अदा-ए-हुस्न से उसने दिवाना मुझको कर डाला।।

२.
मिटाकर द़ाग आये हैं, अभी एहसास बाकी है।
हुआ वो बेवफ़ा तो क्या अभी इख़्लास बाकी है।
खुदा की नेमतों का आज सौदा कर लिया उसने,
मगर इतना बता दूँ मैं अभी इक आस बाकी है।।

3.
दुआ मेरी है' ये रब से, मिले शोह्रत जमाने में।
मुकाबिल आपके कोई न हो सूरत जमाने में।
खुदा तुमको अता कर दे, जहाँ की नेमतें सारी,
मुहाफ़िज़ आपकी हो 'दीप' ये कुदरत जमाने में।।

- प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

हम मुंतजिर उनके हुए....

बहर - २२१२  २२१२  २२१२  २२१२

इस आतिशे फ़ुरकत को' भी जलते ज़माना हो गया।
हम  मुंतज़िर  उनके  हुए  दिल भी दिवाना हो गया।।

कैसे  कहूं  वो  बेवफ़ा   है,   इश्क़   की   तौहीन  है,
आज़ार  ऐसा  मिल  गया,  दिल  शायराना हो गया।

ग़ैरत  भरी  नज़रें  मिली,  छाया  नशा था तन-बदन,
इनकार  उसने  कर  दिया  कैसा  बहाना  हो गया।।

आकर चले जाना हुनर उसका बहुत दिलकश लगा,
बेफ़िक्र  थे  बेइंतहा,  दिल  आशिकाना  हो  गया।।

कस्ती  मिरी  मझधार  में  थी,  इल्म इतना था नहीं,
बेशक सफ़र-ए-जिंदगी मुश्किल निभाना हो गया।।

आशिक़ पुराना 'दीप' था, ज़ज़्बात का, इख़्लास का,
मंज़र  सुना  उसकी  गलीे  का कातिलाना हो गया।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

तन धरा पर ही धरा रह जाएगा...

*हिंदी में ग़ज़ल लिखने का प्रयास*

मापनी- २१२२ २१२२ २१२
जो सुना सब अनसुना रह जाएगा।
मन के मनके में दबा रह जाएगा।

प्रीति सी परिपूर्ण डोरी में बँधो,
साथ सब अपना सगा रह जाएगा।।

नीति नियमों का नया निर्माण हो,
सब पुराना भी कहा रह जाएगा।।

भेद भारत का कभी भी ले सके,
पाक के मन में बसा रह जाएगा।।

वेद शास्त्रों औ पुराणों में लिखा,
तन धरा पर ही धरा रह जाएगा।

मातु धरती हाथ धरती शीश पे,
'दीप' गीतों में लिखा रह जाएगा।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

देश का सुधार हो - रक्ता छंद



🍁रक्ता छंद🍁
रगण जगण गुरु
212  121  2

देश का सुधार हो।
धर्म का प्रसार हो।।
भावना पुनीत हो।
शिष्ट हो विनीत हो।।

नित्य प्रेम योग हो।
देह भी निरोग हो।।
बात का प्रभाव हो।
सौम्य सा स्वभाव हो।।

विश्व में तरंग हों।
लोग संग संग हों।।
गेह नित्य होम हो।
शुद्ध रोम-रोम हो।।

साम्यता घनी रहे।
सौम्यता बनी रहे।।
नित्य नौविहान हो।
नेह का वितान हो।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

नारी सम्मान

*विषय: नारी सम्मान*

*विधा: गद्य*

*"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।*
*यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।।"*
मनुस्मृति के अध्याय ३ की श्लोक संख्या ५६ से प्रारम्भ करते हुए मैं आज नारी सम्मान पर अपनी बात रखने जा रहा हूं। सभी पटल पर उपस्थित धर्मानुरागी सुसाहित्यकारों से शुभाशीष की अपेक्षा करता हूं और नारी सम्मान के प्रति अपनी आस्था का परिचय कराता हूं।

जैसा कि श्लोक से स्पष्ट है कि *"जहां स्त्रीजाति का आदर-सम्मान होता है, उनकी आवश्यकताओं-अपेक्षाओं की पूर्ति होती है, उस स्थान, समाज, तथा परिवार पर देवतागण प्रसन्न रहते हैं । जहां ऐसा नहीं होता और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहां देवकृपा नहीं रहती है और वहां संपन्न किये गये कार्य सफल नहीं होते हैं ।"*

नारी समाज का एक सम्मानित अंग है। वैसे तो सम्मान के अधिकारी सभी होते हैं। नारी-पुरुष, बालक-वृद्ध, धनी-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित, सम्मान सभी को मिलना चाहिए। परन्तु नारी वर्ग को हमारी संस्कृति में सबसे अधिक सम्मान दिया गया है। नारी हमारी मां है, बहन है, बुआ है, भार्या है, अर्थात् सर्वथा पूज्यनीय है। इसी क्रम में गायक साधना जी के मुखारबिंदु से उच्चरित कुछ शब्द ध्यान में आते हैं।

*"नारी है नर की नारी,*
             *नारी है बहना प्यारी।*
 *नारी ने जन्म दियो है,*
             *नारी सबकी महतारी।।"*

हमारी समस्त पौराणिक कथाओं में मातृशक्ति को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है। हम सभी प्रत्येक दिन प्रयोग करने वाले अभिवादन सदृश शब्दों में भी मातृशक्ति काम नाम पहले लेते हैं। जैसे सीताराम, राधेश्याम आदि।

फिर भी दु:ख होता है जब नारी इतनी समर्पण की भावना रखते हुए भी समाज में प्रताड़ित की जाती है। एक दृष्टांत के माध्यम से आप सभी का ध्यान अपनी भावनाओं पर केंद्रित करना चाहता हूँ, *जब हम अपनी पत्नी को प्रताड़ना देते हैं या किसी कारणवश​ अपमानित करते हैं तो संभवतः उसके दो कारण हो सकते हैं,*
*१. या तो हम ये भूल जाते हैं कि आज जो हमारी बेटी या बहन है कल वह भी किसी की पत्नी बनेगी और जब उस पर यही स्थिति आयेगी तो उसे कैसा लगेगा या हमारे मन-मस्तिष्क पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा।*
*२. या तो फिर हम मानव नहीं है, हमारे हृदय में मानवता नहीं है।*

एक साधारण से सिद्धांत को मैं यहां पर प्रस्तुत कर रहा हूं जो मैंने अपने अध्ययन काल में *भूगोल और इतिहास में संबंध* में सीखा था। *"आज का भूगोल कल का इतिहास बन जाता है"* ये सिद्धांत मैं अपनी मातृशक्तियों को समर्पित करता हूं जो नारी होकर नारी का सम्मान नहीं करती हैं। समाज में नारी को मात्र पुरुष वर्ग ने ही नहीं अपितु नारी वर्ग ने भी अपमानित किया है। सास-बहू, भाभी-ननद आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

एक दृष्टि समाज के उस अंग पर डालते चलते हैं जो समाज में एक दंश है, जिसका प्रभाव हमसे जीने का अधिकार ही छीन लेता है। अमानवीय कृत्यों को करने वाले इन लोगों को मानव कहना भी अनुचित होगा, क्योंकि मानव वह जीव है जिसमें मानवता है। जिसमें मानवता का अभाव  है वह मानव बिना सींग और पूँछ का जानवर  है। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि *"वह तो पशु है अब छोड़ इसे, पर सींग पूँछ बिनु बूँचा है।"*

और चलते चलते एक दृष्टि मनुस्मृति के अध्याय ३ श्लोक संख्या ६० पर डालते हुए अपनी बात सम्पन्न करता हूं।

*"सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च ।*
*यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ।।"*

अर्थात् जिस कुल में प्रतिदिन ही पत्नी द्वारा पति संतुष्ट रखा जाता है और उसी प्रकार पति भी पत्नी को संतुष्ट रखता है, उस कुल का भला सुनिश्चित है । ऐसे परिवार की प्रगति अवश्यंभावी है ।

*-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'*

प्रेम

*विषय: प्रेम धन*
*विधा: मुक्त*

प्रेम को परिभाषित कर पाना अत्यंत दुष्कर है। ढाई अक्षर का शब्द 'प्रेम' समस्त चराचर को एक करने की सामर्थ्य रखता है। हमारे समाज, कवि, साहित्यकार और दार्शनिकों ने समय समय पर प्रेम को समझने समझाने का प्रयास किया। आज हम उस प्रेम धन पर अपनी बात रखने जा रहे हैं।

प्रेम विश्वास है, प्रेम त्याग है, प्रेम बलिदान है, प्रेम ममता है, प्रेम सम्मान है, प्रेम वात्सल्य है, प्रेम अनुभूति है, प्रेम बंधन है।

बहुत सौभाग्यशाली होते हैं जिन्हें प्रेम धन की पूंजी प्राप्त होती है। प्रेम की कुछ झलकियां हम यहां प्रस्तुत​कर रहे हैं।

"प्रेम राधा ने कृष्ण से किया था। कहते कि एक बार रूक्मिणी ने श्रीकृष्ण जी को गर्म दूध पीने हेतु दिया, विदित हो कि राधा जी को छाले पड़ गए थे।"

"प्रेम मीरा ने गिरधर से किया था। राणा जी द्वारा विष दिए जाने पर मीरा ने विषपान कर लिया और गिरधर जी की कृपा से उनका कुछ भी अनर्थ नहीं हुआ।"

"प्रेम शबरी ने राम से किया था। भगवान राम ने जंगल में शबरी के जूठे बेर खाए थे।"

"प्रेम सीता जी ने राम से किया था। लंकापति रावण सीता जी के सतीत्व को डिगा नहीं सका।"

"प्रेम भगत सिंह ने किया था। हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया। हमारे सभी देशभक्तों को अपनी मातृभूमि से प्रेम है।"

"सावित्री ने सत्यवान से किया था। पति के प्राणों को यमराज से भी वापस लौटा लिया।"

प्रेम धन असीम है, वर्णन कर पाना बहुत कठिन है। आप लोगों के समझ कुछ प्रेम के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

गरल

"गरल"

जैसा कि हम व्यावहारिक जीवन में देखते हैं कि गरल (विष) का कार्य है, अचैतन्यता देना। गरल हमारे रग-रग में अपना प्रभाव करता है और शरीर की कोशिकाओं को अचैतन्य बनाता है।
यदि हम कहना चाहें तो हम ये भी कह सकते हैं कि चराचर में व्याप्त वह प्रत्येक वस्तु गरल है जो किसी अन्य वस्तु को अचैतन्यता प्रदान करती है या अचैतन्यता का कारण बनती है। समाज में व्याप्त ऐसी कुरीतियों को भी गरल की संज्ञा दी जाती है जो हमारी सभ्यता और संस्कृति की विनाशक हैं। समाज में हो रहे अनैतिक, अमानवीय कृत्य और व्यवहार को भी गरल कहना ही उचित होगा। कहते हैं कि जिसका जो स्वभाव, जो प्रभाव होता है वह दिखाता अवश्य है, ठीक उसी प्रकार गरल भी अपना प्रभाव दिखाता ही है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में लिखा है कि

"भलो भलाइहि पै लहइ, लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरता गरल सराहिअ मीचु।।"

अर्थात् जिसका जो स्वभाव है वैसा ही उसका प्रभाव दिखता है। जिस प्रकार अमृत अपने अमरत्व और विष मृत्यु के लिए जाना जाता है।

इसके साथ ही एक विषय पर और दृष्टिपात करना आवश्यक हो जाता है कि जो सज्जन पुरुष (अमृत) हैं उन पर गरल (कुरीतियों) का कोई प्रभाव नहीं होता। रहीम जी के एक दोहे पर दृष्टिपात करते हैं

"जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।"

अर्थात् जो लोग उत्तम प्रकृति (स्वभाव) के हैं, उन पर नीचता कभी अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती, जिस प्रकार चंदन के पेड़ में सर्पों के लटके रहने से भी विष का प्रभाव नहीं होता है।
दूसरी बात यह है कि जब भगवान की कृपा होती है तब भी गरल का कोई प्रभाव नहीं होता है, तुलसीदास विरचित कुछ पंक्तियां देखिए।

"गरल सुधा रिपु करहि मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई।।"

अर्थात् भगवान का नाम लेकर हनुमान जी ने जब लंका में प्रवेश किया तब कोई कार्य भला कैसे न सिद्ध होता। क्योंकि जब भगवान की कृपा होती है, तब गरल अमृत बन जाता है, शत्रु मित्रवत व्यवहार करने लगता है, समुद्र गाय के खुर के समान प्रतीत होता है और आग में भी शीतलता का अनुभव प्राप्त होने लगता है।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

मुक्तक भाग - १

१.
वफ़ा ईमान खुद्दारी, हुनर ज़ज़्बा चला जाता।
हमारी जान से बढकर, न कुछ ज्यादा चला जाता।
ज़रा सी बात पर तुमने, हमारा साथ छोड़ा है,
अगर तुम साथ चलते तो, तुम्हारा क्या चला जाता।

२.
कोई ताकत कोई चाहत, कोई धन का पुजारी है।
किसी को भूख इज़्ज़त की, कोई सुख का भिखारी है।
निभाने को निभा लेते हैं, रश्में सब ज़माने की
निभाना है अगर मुश्किल तो' वो ईमानदारी है।।

३.
दुआ मेरी है' ये रब से, मिले शुहरत जमाने में।
मुकाबिल आपके कोई न हो सूरत जमाने में।
खुदा तुमको अता कर दे, जहाँ की नेमतें सारी,
मुहाफ़िज़ आपकी हो 'दीप' ये कुदरत जमाने में।।

४.
विश्वगुरु संकल्पना का एक ही आधार है।
त्याग निष्ठा और समर्पण, बस यही पतवार है।
एकदंता, शत्रुहंता, जगनियंता साथ तो,
धर्मक्षेत्रे, कर्मक्षेत्रे विजय-पारावार है।

५.
रहो खुशहाल जीवन में, यही है कामना मेरी।
मिले सुख चैन सब तुमको है प्रभु से याचना मेरी।।
चलो सन्मार्ग पर हरदम, दिखाओ रास्ता सबको,
बनो यश-कीर्ति के भागी यही है भावना मेरी।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

झलक भारत के इतिहास की

*झलक भारत के इतिहास की*

भारत को आर्यावर्त कहा जाता है। आर्य (श्रेष्ठ) लोगों का यहाँ निवास रहा है। ऋग्वेद में इसे "सप्तसिंधु" प्रदेश  कहा गया। ऋग्वेद के नदीसूक्त में (१०/१५) में आर्यावर्त में प्रवाहित नदियों का एकत्र वर्णन है, जिसमें काबुल, कुर्रम, गोमती, सिंधु, रावी,  सतलज, झेलम, सरस्वती, यमुना और गंगा आदि प्रमुख नदियाँ हैं।

सनातन धर्म सबसे प्राचीन धर्म है।  हमें पढ़ाया जाता है कि वर्ष १४९८ ई० में वास्को डी गामा ने भारत की खोज की। मैंने भी पढ़ा है परंतु आज तक यह नहीं समझ में आ सका कि हमारा आर्यावर्त कहीं खो गया गया था क्या? जिसे १४९८ ई० में वास्को डी गामा द्वारा पुनः खोजा या फिर भारत की रचना ही वास्को डी गामा ने की। उत्तर जो भी हो, परंतु सत्य यही है कि आजकल जो इतिहास हमें पढ़ाया जा रहा है, वह हमें दिग्भ्रमित करने के लिए है। वास्तविकता छुपाई जा रही है और इतिहास को अपने अनुसार प्रस्तुत किया जा रहा है या वास्तविक ज्ञान के अभाव में मनगढ़ंत बातों का समावेश किया जा रहा है। मेरा प्रश्न है कि भारतीय इतिहास को समझने के लिए कौन सी पुस्तकें पढ़ना आवश्यक है? गीता, श्रीरामचरितमानस, रामायण, महाभारत या फिर विदेशी लेखकों की पुस्तकें जिन्हें सनातन धर्म के बारे में "स" भी नहीं पता। हमारे यहाँ आज भी *"सनातन धर्म की - जय"* बोली जाती है।
विश्व में सबसे पहले आकाश में उड़ने वाला विमान मुनि भरद्वाज ने बनाया था जिसका नाम "पुष्पक" था। (विकपिडिया में इसे अंगिरा ऋषि द्वारा बनाया हुआ बताते हैं, कुछ अन्य स्थानों पर जैसे वाल्मीकि रामायण में इसे विश्वकर्मा द्वारा बनाया हुआ बताते हैं) परंतु वास्तविकता ज्ञात करने के लिए हमें महर्षि भरद्वाज कृत ग्रंथ *"वैमानिक शास्त्र"* को पढ़ना चाहिए। यह ग्रंथ महर्षि भरद्वाज के प्रमुख ग्रंथ *"यंत्र सर्वेश्वम्"* का एक भाग है।  *"वैमानिक शास्त्र"* में ८ अध्याय १०० अधिकरण, ५०० सूत्र और ३००० श्लोक हैं। यह ग्रंथ वैदिक संस्कृत भाषा में है।

चिकित्सा पद्धति के लिए आयुर्वेद का मूल ग्रंथ *"चरक संहिता"* है। यह प्रसिद्ध ग्रंथ भी संस्कृत भाषा में है। *"चरक संहिता"* में ८ भाग और १२० अध्याय हैं। इसके रचयिता आचार्य चरक थे।  आचार्य चरक की शिक्षा *"तक्षशिला"* में हुई थी। *"तक्षशिला"* आर्यावर्त के गांधार देश की राजधानी और शिक्षा का प्रमुख केद्र था। यहाँ का विश्वविद्यालय विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालयों में सम्मिलित है। आचार्य चाणक्य यहाँ के आचार्य थे।  आजकल यह स्थान पाकिस्तान के रावलपिंडी में है। *"तक्षशिला"* का उल्लेख रघुवंश, रामायण, वायु पुराण, महाभारत आदि ग्रथों में किया गया है।

विश्व के प्रथम शल्यचिकित्सक महान चिकित्साशास्त्री *"आचार्य सुश्रुत"* भारत के थे। इनका जन्म पूर्वी उत्तर प्रदेश में *"काशी"* में हुआ था। इन्होंने *"सुश्रुत संहिता"* की रचना की है। *"आचार्य सुश्रुत"* ने वैद्यराज धन्वंतरि से शिक्षा प्राप्त की थी। शल्य चिकित्सा में आचार्य सुश्रुत १२५ प्रकार के उपकरणों का प्रयोग करते थे।  आचार्य सुश्रुत ने ३०० प्रकार की शल्य प्रक्रियाओं की खोज की थी। आचार्य सुश्रुत नेत्र शल्य चिकित्सा भी करते थे। शल्य चिकित्सा द्वारा प्रसव कराने का ज्ञान भी सुश्रुत के पास था।

भारतीय अंक गणना (गणित) में जो स्थान आर्यभट्ट और भास्कराचार्य जी का है, वह अविस्मरणीय है। शून्य की खोज आर्यभट्ट ने की। वर्ष ४९८ ई० में आर्यभट्ट ने अपने ग्रंथ *"आर्यभट्टीय"* (संख्यास्थाननिरूपणम्) में लिखा है..

*"एकं च दशं च शतं च सहस्त्रं तु अयुतनियुते तथा प्रयुतम्।*
*कोट्यर्बुदं च वृन्दं स्थानात्स्थानं दशगुणं स्यात्।।"*
अर्थात् एक, दश, शत, सहस्त्र, अयुत (दश हजार), नियुत (लाख), प्रयुत (दश लाख) , कोटि (करोड़), अर्बुद (दश करोड़)  तथा बृंद (अरब) में प्रत्येक पिछले स्थान वाले से अगले स्थान वाला दस गुना है।

उपर्युक्त समस्त ऐतिहासिक उपलब्धियों को वर्तमान की पुस्तकों से पृथक किया जाने लगा है। मेरी अभिलाषा है कि यदि भविष्य में साहित्य संगम संस्थान ने अपना पुस्तकालय स्थापित किया तो इन सभी पुस्तकों की उपलब्धि मैं करवाऊँगा। भारतीय इतिहास हमारी अमूल्य धरोहर है। इसे बचाकर रखना हमारा नैतिक कर्तव्य है।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

बुधवार, 3 अक्तूबर 2018

वफ़ादा होकर वफ़ा कर न पाए....

122   122 122 122
[बहर-ए-मुत्कारिब मुसम्मन सालिम]

वफ़ादार  होकर   वफ़ा   कर  न  पाए।
मगर उनको दिल से जुदा कर न पाए।।

हमारी  तो  ज़ाँ   माँग  ली   है  उन्होंने,
जिन्हें चाह कर भी मना कर न  पाए।।

हज़ारों   दुआएँ   ख़ुदा  से   हैं   माँगी,
मगर ख़ुदकुशी की दुआ कर न पाए।।

तमन्ना   तुम्हारे  तो   दीदार   की  थी,
तुम्हारा पता  ही   पता कर  न पाए।।

जहाँ में हज़ारों  हुनर  सीख  कर  भी,
महज़ हम किसी से दग़ा कर न पाए।।

शिकायत हमेशा रही हमको फिर भी,
कभी  जिंदगी  से  गिला कर न पाए।।

ख़ता  'दीप'  की  सिर्फ़  इतनी  रही  है,
उन्हें अपनी साँसें  अता कर  न  पाए।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

मंगलवार, 2 अक्तूबर 2018

नशा प्यार का इस कदर हो गया है..

नशा प्यार का इस  कदर  हो  गया  है।
ज़माने से दिल  बे-ख़बर हो  गया  है।।

कभी  अज़नबी  जो  हमारे   लिए  था,
वही  आजकल  मोतबर  हो  गया है।।

नया   शहर  है   और   रिश्ते   नए   हैं,
यही सोचकर मुझको डर  हो गया है।।

न जाने हुआ क्या इन आँखों  को  मेरी,
मुझे  जागते  रात  भर  हो   गया   है।।

मुहब्बत   के   वादे    निभाते   निभाते
ये कुर्बान जान-ओ-जिगर हो गया है।।

जो दिल अपना हारा था उल्फत में तेरी,
तुझे  पाने  के  बाद  सर  हो  गया  है।।

मिला साथ तेरा जो मुझको तो फिर से
हरा  ज़िन्दगी  का  शज़र  हो  गया है।।

पड़े नक्श तेरे जो  घर  में  तो  फिर  से,
मेरा घर हक़ीक़त में  घर  हो  गया  है।।

रहा  मुझपे  ऐसा  करम  उस ख़ुदा का,
ज़रूरत के माफ़िक़ बसर  हो गया है।।

चढ़ा  हुस्न  उसका जो परवान पर  तो,
मेरा  इश्क़ भी  पुर-असर हो  गया है।।

कदम से कदम 'दीप' जब से  मिलाए,
तो आसान कितना सफ़र हो गया है।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

सोमवार, 1 अक्तूबर 2018

देश से द्रोहियों को वफ़ा कीजिए

बहर: २१२ २१२ २१२ २१२

देश से द्रोहियों को दफ़ा कीजिए।
ये वतन है वतन से वफ़ा कीजिए।।

तोड़ देना अगर हाथ उठने लगें,
बेवज़ह मत किसी को ख़फ़ा कीजिए।।

हम न हारे तवारीख करती बयां,
फ़र्ज़ अपना अदा बावफ़ा कीजिए।।

मुश्किलों का करो उम्र भर सामना,
देशहित में जियो मत जफ़ा कीजिए।।

चैन की नींद सोयें यहां पर सभी,
ज़िन्दगी का यही फ़लसफ़ा कीजिए।।

'दीप' हासिल अगर हो शहादत तुम्हें,
एक-दो बार क्या हर दफ़ा कीजिए।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

सच है कि ज़िन्दगी में........

बहर: २२१ २१२२ २२१ २१२२

सच है कि ज़िन्दगी में, अरमां सजेंगे' न्यारे।
हर मोड़ पे यहां भी, आशिक मिलेंगे' न्यारे।।

बदनाम हो न जाए, मां भारती का' दामन,
शरहद पे' होके' कुर्बां किस्से लिखेंगे' न्यारे।।

हर हाल में हमें ये, है जंग जीतना अब,
इक इब्तिसाम पर ही, गुलशन खिलेंगे' न्यारे।।

मां-बाप की इबादत, बढ़कर खुदा से' होती,
रहमो करम हुआ तो, सब सुख रहेंगे' न्यारे।।

आग़ाज़ हो चुका है, अंज़ाम देखना है,
कोशिश यही रहेगी, सँग सँग चलेंगे न्यारे।।

किस्मत मिली ये' कैसी इस 'दीप' को जहां में,
ग़ुरबत में' जिसको' शायर, बेशक कहेंगे' न्यारे।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

ग़म की ख़ुशी की यारा आसार ज़िन्दगी है...

बहर: २२१ २१२२ २२१ २१२२

गम की खुशी की' यारा, आसार ज़िन्दगी है।
तुम हो तो' ठीक बरना, बेकार ज़िन्दगी है।।

मत फेर मुझसे' नज़रें, मत कर गुरूर इतना,
तेरे ही' संग मेरी, साकार ज़िन्दगी है।।

कुछ कर गुज़रने' की है चाहत हमारे' दिल में,
खातिर वतन की' हमको दरकार ज़िन्दगी है।।

श्रीराम कृष्ण​ परशू, नरसिंह, मत्स्य वाराह,
बुध कूर्म कल्कि वामन अवतार ज़िन्दगी है।।

ढाये सितम हज़ारों बेशक कसूर क्या था,
अब होती' जा रही ये, सरकार ज़िन्दगी है।।

पढ़ लीजिए सभी अब इस 'दीप' की कहानी,
ऐसा लगेगा' मानों अख़बार ज़िन्दगी है।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

अभिलाषा यही है, स्वर।गया हिंदुस्तान हो।

नवगीतिका: २१२२ २१२२ २१२२ २१२

राष्ट्रहित का भाव जागे, देश का सम्मान हो।
विश्वगुरु संकल्पना का, आज फिर आह्वान हो।।

राष्ट्र की आराधना हो, और नित यशगान हो।,
देश का हर नागरिक, धनवान हो बलवान हो।।

मृत्यु अपने धर्म में, मिल जाए' तो सौभाग्य है,
दूसरों के धर्म का लेकिन नहीं अभिमान हो।।

धर्मक्षेत्रे कर्मक्षेत्रे, सर्वक्षेत्रे हो विजय,
नीति के पालक बनो सब, और निष्ठावान हो।।

त्याग निष्ठा औ समर्पण, भावना मन में रहे,
'दीप' अभिलाषा यही है, स्वर्ग हिंदुस्थान हो।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

दूरियाँ दिलों की सब, आज अब मिटाना है

दूरियाँ  दिलों  की  सब,  आज अब मिटाना  है।
रूठने   मनाने   का,   सिलसिला    पुराना  है।।

किसको क्या  कहूँ अब मैं?  बेवफ़ा ज़माना है।
आज वह पराया है, अपना' जिसको  जाना है।।

बेकरारियाँ   दिल   को,   रात   दिन   सतायेंगी,
याद  ये  रहेगा  अब,  दिल   नहीं  लगाना  है।।

रात   बीतती   मेरी,   उसके   ही   ख़यालों   में,
मकसद एक अरसे से, जिसको भूल जाना है।।

बेबसी  बयाँ  उससे,   कैसे   मैं   करूँ   अपनी,
होके  जो  जुदा  मुझसे,  बन  गया बिगाना है।।

लुट  गया  दिल उल्फ़त में, नासबूर आशिक़ हूँ,
हासिले  मुहब्बत  क्या?  नाम का फ़साना है।।

देख  अपनी  हालत  को,  आँख डबडबा आई,
'दीप' रागे इश्'रत अब, ग़म का बस तराना है।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

अँग्रेजों ने रण में जिससे इक दिन मुँह की खाई थी

अँग्रेजों  ने रण में  जिससे,  इक  दिन  मुँह  की खाई थी।
वह   भारत   माता   की   बेटी,   रानी   लक्ष्मीबाई   थी।।

बचपन  से  ही  जिसने  बरछी  और  तलवार  उठाई थी।
जिसने अपना सब कुछ खोकर, माँ की लाज़ बचाई थी।।

बाँध  पीठ पर   सुत  को  जिसने,  रण में धूम मचाई थी।
जिसके  शौर्य  पराक्रम  से  दुश्मन  सेना   चकराई  थी।।

रण  में  जिसने  दोनों  हाथों   से   तलवार   चलाई   थी।
रणचंडी  बनकर  दुश्मन  को,  नानी  याद  दिलाई  थी।।

अरिमुण्डों  को  काट-काटकर, जिसने  नदी  बहाई  थी।
खट्टे  दाँत  किये  दुश्मन  के,  ऐसी   मार   लगाई   थी।।

समय किसी का सगा न होता,  समय ने दृष्टि घुमाई थी।
रानी   एक   शत्रु   बहुतेरे,   पड़ी   सामने   खाई   थी।।

हुए  वार  पर  वार  मगर,  रानी  न  तनिक घबराई  थी।
शायद  अंतिम  बार   लक्ष्मी  ने  तलवार    उठाई   थी।।

अरि  के  सीने  चीर-चीर  कर  जिसने चिता सजाई थी।
उसे  देख  कर  आँखों   से,  जलधारा  बह  आई   थी।।

रानी  आज  नहीं  है  लेकिन,  याद  सभी को आई थी।
भस्म  चिता  की  उठा सभी ने, अपने शीश लगाई थी।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

आओ मिलकर दीप जलाएँ - गीत

आओ मिलकर दीप जलाएँ।
       अँधियारे से मुक्ति दिलाएँ।
              अंधकार में बिछड़ गये जो,
                   पुनः उन्हें अब साथ मिलाएँ।।

राष्ट्रभक्ति का भाव जगाकर,
       दंभ-द्वेष को दूर भगाकर,
             जन-जन को निज मीत बनाकर
                   हिन्दु राष्ट्र को एक बनाएँ।।

संघ शक्ति की बने भावना,
     युवा शक्ति को पड़े जागना,
            सर्व शक्ति को ऐक्य बनाकर,
                   ध्येय मार्ग को हम अपनाएँ।।

यही 'दीप' के मन की आशा,
       सूर्योदय हो मिटे कुहासा,
            जीवन बने सफल परिभाषा
                  ऐसा जीवन हम जी पाएँ।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

मेरी रश्क़े क़मर, महफ़िले इश्क़ में

बह'र : २१२*८

मेरी' रश्के-क़मर, महफ़िले-इश्क़ में, तेरा' नज़रें उठाना ग़ज़ब हो गया।
देख तेरी अदा, गिर गये झूमकर, यूँ ते'रा मुस्कुराना ग़ज़ब हो गया।।

क्या नज़ारा था' वो, उस हसीं रात में, खूब रंगीन दिलकश ख़यालात में,
धड़कने रुक गईं, चाँद शरमा गया, रुख से पर्दा हटाना ग़ज़ब हो गया।।

मयकदों पे हुई मयकशी आज तक, ज़ाम पे ज़ाम साकी पिलाती रही,
जो नज़र की अता, रब ने' तुमको सनम, उस नज़र से पिलाना ग़ज़ब हो गया।।

दिल तलब़ग़ार था तू सितमगर सनम, तीर-ओ-तलवार की क्या ज़रूरत तुझे,
क़ातिलाना अदा मल्लिका हुस्न की, बर्क़ दिल पे गिराना ग़ज़ब हो गया।।

दिल की' दहलीज़ पे आ गये 'दीप' जब, तुम हमारे हुए, हम तुम्हारे हुए,
हमसफ़र हमनशीं रहगुज़र अपना' भी, इस जहाँ में फ़साना ग़ज़ब हो गया।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'