सोमवार, 1 अक्तूबर 2018

दूरियाँ दिलों की सब, आज अब मिटाना है

दूरियाँ  दिलों  की  सब,  आज अब मिटाना  है।
रूठने   मनाने   का,   सिलसिला    पुराना  है।।

किसको क्या  कहूँ अब मैं?  बेवफ़ा ज़माना है।
आज वह पराया है, अपना' जिसको  जाना है।।

बेकरारियाँ   दिल   को,   रात   दिन   सतायेंगी,
याद  ये  रहेगा  अब,  दिल   नहीं  लगाना  है।।

रात   बीतती   मेरी,   उसके   ही   ख़यालों   में,
मकसद एक अरसे से, जिसको भूल जाना है।।

बेबसी  बयाँ  उससे,   कैसे   मैं   करूँ   अपनी,
होके  जो  जुदा  मुझसे,  बन  गया बिगाना है।।

लुट  गया  दिल उल्फ़त में, नासबूर आशिक़ हूँ,
हासिले  मुहब्बत  क्या?  नाम का फ़साना है।।

देख  अपनी  हालत  को,  आँख डबडबा आई,
'दीप' रागे इश्'रत अब, ग़म का बस तराना है।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'