शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

गुरु

गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर।
गुरु साक्षात् परमं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।।

अर्थात् गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही शंकर है, गुरु ही साक्षात परब्रह्म है, ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं।

आज गुरु पूर्णिमा है। गुरु के प्रति आस्था और श्रद्धा से समर्पण का दिवस है। गुरु हमें जीवन पर्यन्त शिक्षा प्रदान करते हैं, अच्छे-बुरे का बोध कराते हैं। गुरु इसके बदले में हमसे कभी कुछ लेने की अभिलाषा नहीं रखते, क्योंकि गुरु देने वाले होते हैं, वो हमसे कभी कुछ मांगते नहीं हैं। गुरु के भावों को कुछ पंक्तियों में इस प्रकार समाहित किया जा सकता है कि,

गुरु पारसमणि के समान होता है, जो लोहे को सोना बनाने का कार्य करता है। गुरु के सानिध्य में जो आया उसका कल्याण हुआ। गोस्वामी तुलसीदास जी विरचित श्रीरामचरितमानस के अनुसार,

गुरु बिनु भवनिधि तरइ न कोई।
जो बिरंचि शंकर सम होई।।

श्रीरामचरितमानस में इस बात का उल्लेख किया गया है कि गुरु के बिना इस संसार सागर को पार कर पाना असम्भव है, अर्थात् गुरु के बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है, फिर
चाहे वह, ब्रह्मा जी या शंकर जी ही क्यों नहीं हों। गुरु का स्थान सर्वोपरि माना गया है। हमारा गुरु कोई भी हो सकता है, ये आवश्यक नहीं है कि वह टेलीविजन पर आने वाला कोई प्रख्यात व्यक्ति हो, साधारण व्यक्ति भी हमारा गुरु हो सकता है, अर्थात् जो हमारा मार्गदर्शन कर हमें सत्पथ पर चलने के लिए प्रेरित करे वही गुरु है। सबसे पहले हमारी गुरु हमारी मां होती है, जो हमें उंगली पकड़कर चलना सिखाती है, अच्छे-बुरे का बोध कराती है, और इस चराचर की विभिन्न वस्तुओं से अवगत कराती है। मां सर्वथा पूज्यनीय है। गुरु की आस्था और विश्वास पर कबीरदास​जी ने कुछ ऐसे कहा है कि,

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद जी बताय।।

अर्थात् बाबा कबीरदास जी कहते हैं कि, गुरु और ईश्वर दोनों ही सामने हैं, असमंजस की घड़ी है कि प्रथम प्रणाम किसको करना है, तो बाबा कबीरदास जी ने स्पष्ट किया है कि ये गुरु का हम पर अहसान है कि हमें ईश्वर की प्राप्ति हुई है, इसलिए गुरु प्रथम प्रणाम के योग्य है।

बाबा कबीरदास जी और आगे गुरु की महिमा काम वर्णन करते हुए कहते हैं कि,

सात समंदर मसि करूं, लेखन सब वनराय।
सब धरती कागज करूं, गुरु गुण लिखा न जाय।।

जो लोग कहते हैं कि हम तो मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च में जाते हैं तो उन्हें गुरु की क्या आवश्यकता है तो उनके लिए भी हमारे पास उत्तर है,

राम कृष्ण से को बड़े, तिंहू ने गुरु कीन्ह।
तीन लोक के नायका, गुरु आगे आधीन।।

अर्थात् भगवान श्रीराम चंद्र जी और श्री कृष्ण जी से कौन बड़ा है, उन्होंने भी गुरु बनाया, तीनों लोकों के स्वामी गुरु के प्रति नतमस्तक हैं, मानव जाति के लिए एक आदर्श बनकर, एक प्रमाण बनकर, एक उदाहरण बनकर।

गुरु के उपकारों का उल्लेख कुछ इस श्लोक में दृष्टव्य है,

अखंड मंडलाकारं व्याप्तं एन चराचरं।
तय्पदं दर्शिनं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

अर्थात् संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त जगत नियंता ईश्वरीय शक्ति का, अन्तर्घट में ही दर्शन करा देने वाले गुरु को मैं बारम्बार प्रणाम करता हूं।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'