शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

हम मुंतजिर उनके हुए....

बहर - २२१२  २२१२  २२१२  २२१२

इस आतिशे फ़ुरकत को' भी जलते ज़माना हो गया।
हम  मुंतज़िर  उनके  हुए  दिल भी दिवाना हो गया।।

कैसे  कहूं  वो  बेवफ़ा   है,   इश्क़   की   तौहीन  है,
आज़ार  ऐसा  मिल  गया,  दिल  शायराना हो गया।

ग़ैरत  भरी  नज़रें  मिली,  छाया  नशा था तन-बदन,
इनकार  उसने  कर  दिया  कैसा  बहाना  हो गया।।

आकर चले जाना हुनर उसका बहुत दिलकश लगा,
बेफ़िक्र  थे  बेइंतहा,  दिल  आशिकाना  हो  गया।।

कस्ती  मिरी  मझधार  में  थी,  इल्म इतना था नहीं,
बेशक सफ़र-ए-जिंदगी मुश्किल निभाना हो गया।।

आशिक़ पुराना 'दीप' था, ज़ज़्बात का, इख़्लास का,
मंज़र  सुना  उसकी  गलीे  का कातिलाना हो गया।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'