शनिवार, 6 अक्तूबर 2018

किसी के मुक़ाबिल झुका मैं नहीं हूँ...


*[बहर-ए-मुत्कारिब मुसम्मन सालिम]*
*[122 122 122 122]*

किसी  के  मुक़ाबिल  झुका मैं नहीं  हूँ।
मगर   हाँ!  ख़ुदा से बड़ा  मैं  नहीं  हूँ।।

किसी  के  लिए  गर  मरा  भी नहीं   तो,
फ़क़त अपनी ख़ातिर जिया मैं नहीं हूँ।।

उसूल  एक  बस  जिंदगी  का  रहा है,
ग़लत  रास्ते  पर  चला  मैं   नहीं   हूँ।।

वफ़ा  कर  न  पाना   मेरी  बेवशी  थी,
हक़ीक़त  में  तो  बेवफ़ा  मैं  नहीं  हूँ।।

सताती रही जो  दिवानों  के  दिल को,
किसी की वो नाज़ुक अदा मैं नहीं हूँ।।

शराफ़त  से  जीना ही  सीखा  है  मैंने,
सियासी  कोई  वाकया  मैं   नहीं  हूँ।।

भले  दूर  है  ज़ुर्म  से  'दीप'  अब तक,
मगर दूध  का  भी  धुला  मैं  नहीं  हूँ।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'