शनिवार, 6 अक्तूबर 2018

मानवता - कहानी

*लघुकथा / मानवता*

शाम के ७ बज रहे थे। प्रतिदिन की भाँति मैं टहलते हुए सड़क के किनारे-किनारे जा रहा था। सहसा एक हृदय को विदीर्ण करने वाली ध्वनि कानों तक पहुंचती है। देखा तो सड़क के किनारे कुछ लोग एकत्रित हैं, शायद किसी दुर्घटना की संभावना प्रतीत हुई। मैं भाग कर भीड़ के पास पहुचा। मेरा अनुमान सही निकला था। एक दुर्घटना हुई थी। दुर्घटना में मोती बुरी तरह घायल हो चुका था और जोर-जोर से करुण-क्रंदन कर रहा था।

दरअसल ये दुर्घटना एक कार से हुई थी, कार का चालक संभवतः मद्यपान किया हुआ प्रतीत हो रहा था। कार में बैठे अन्य लोग भी संभवतः मद्यपान किते हुए थे। मोती को देखकर मेरी आंखें भर गई थीं। कार सवार व्यक्तियों को देखकर प्रतीत हो रहा था कि किसी धनी परिवार से उनका संबंध है। मेरा मन आहत हो चुका था, रह रहकर मुझे सभी पर क्रोध आ रहा था जो खड़े-खड़े किसी की असहाय स्थिति की चर्चा किए जा रहे थे।

अचानक मेरी नज़र राघव पर गयी, जो पिछले कुछ दिनों से मेरे ही घर के पास आकर रहने लगे थे। स्वभाव से बहुत ही शांत थे, ईश्वर की पूजा पाठ में अनुराग होने से मेरी - उनकी मित्रता बहुत शीघ्र ही हो गयी थी। उन्हें देखकर मेरा साहस बढ़ा और मैंने उन्हें आवाज दी। सहसा किसी का ध्यान मेरी ओर तो किसी का ध्यान राघव की ओर आकृष्ट हो गया। सभी स्तब्धता के साथ हमें देख रहे थे। राघव के पास एक पुराना स्कूटर था जो उन्होंने दो माह पूर्व ही ५००० रु देकर गुप्ता साहब से खरीदा था।

हमने मोती को उठाया और स्कूटर पर लेकर पशु चिकित्सालय की ओर चल पड़े। पशु चिकित्सालय थोड़ा दूर होने से लगभग एक घंटे के बाद हम चिकित्सालय पहुंचे, रात का ९:१५ बज चुके थे, चिकित्सालय बंद था। मैं फिर निराशा की रजनी में सोने लगा। तभी अचानक किसी के खाँसने की आवाज आई। शायद मेरी निराशा की  रात की सुबह हो गई थी। पास जाकर देखा तो एक परिवार भोजन कर रहा था। परिवार में कुल ७ सदस्य थे। पति-पत्नी, उनका १ पुत्र और ४ पुत्रियां। मैंने आवाज़ दी तो वो सज्जन व्यक्ति घर से बाहर आए, पता करने पर बताया कि वह चिकित्सालय के चौकीदार हैं। मैंने उन्हें घटना के बारे में अवगत कराया। पूछने पर उसने डॉ ० साहब का पता बताया। उसे धन्यवाद कहकर मैंने राघव को मोती के पास वहीं छोड़ा और स्वयं स्कूटर से डाक्टर साहब के घर की तरफ चल पड़ा।

डॉ ० साहब के घर पहुंच कर मैंने डोरबेल बजायी, अंदर से श्रीमती जी बाहर आयीं। मैंने नमस्ते! कहकर डाक्टर साहब के बारे में पूछा तो पता चला कि वो अपने किसी मित्र के घर गये हैं। मैंने श्रीमती जी से उनकी चलभाषा संख्या लेकर संपर्क किया तो प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। मुझसे घटना की जानकारी सुनकर शायद डाक्टर साहब ने चिकित्सालय जाने के लिए अपनी स्वीकृति दे दी थी।

मैं स्कूटर लेकर तक्षशिला कोलोनी पहुंचा और डाक्टर साहब को लेकर पशु चिकित्सालय की ओर चल दिया। रास्ते में मैंने उनका शुभनाम पूछा तो उन्होंने करुणासागर बताया। मुझे अपार हर्ष हो रहा था *यथा नाम तथा गुणा:*। करुणासागर साक्षात करुणा की मूर्ति थे। रात के १०: ४५ बज रहे थे और हम स्कूटर से चिकित्सालय की ओर तेजी से चले जा रहे थे।

चिकित्सालय पहुंच कर करुणासागर जी ने चौकीदार को चिकित्सालय खोलने के लिए कहा। चौकीदार ने चिकित्सालय खोला। डॉ ० करुणासागर ने मरहम पट्टी की। चोट अधिक गहरी होने से दो दिन में फिर आने को कहा।

दो दिन बाद हम फिर मोती को लेकर चिकित्सालय पहुंच गये। इस बार राघव को किसी कारण से अपने पैतृक गांव जाना पड़ गया था इसलिए मेरे साथ मेरे मित्र करन आये थे।

दवाई देकर डा० करुणासागर ने फिर एक सप्ताह में आने को कहा। इस प्रकार लगभग ३ माह के बाद मोती के घाव पूरी तरह से भर गये, मगर पिछली दोनों टांगों के टूट जाने से मोती सरक-सरक कर चल तो सकता है, परन्तु भाग नहीं सकता, दौड़ नहीं सकता।

तब से लेकर आज तक मोती मेरे यहां ही रहता है, पड़ोसी लोगों का दुलार उसे उसके दर्द को कम करने की भरपूर कोशिश करता है।।

मोती आज मेरे लिए पालतू जानवर से भी ज्यादा प्यारा है, कारण उसकी बेबसी, उसकी लाचारी और उसका असहायपन।

लेखक -प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

नोट: ये लघुकथा पूर्णतया काल्पनिक है, किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान अथवा समय से इसका कोई लेना देना नहीं है। प्रतिलिपि अधिकार अधिनियम के तहत आप इसे शेयर कर सकते हैं या बिना तोड़-मरोड़ किये लेखक के नाम के साथ कहीं कापी-पेस्ट कर सकते हैं।