शनिवार, 6 अक्तूबर 2018

मेरे दुश्मनों की मज़ाल है...

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*बह्र-ए-कामिल मुसम्मन सालिम*

*मुतफ़ाइलुन * ४*
*११२१२ x ४*

ये' मिसाल है, मिरे' इश्क़ की, ये' मिरी वफ़ा का' कमाल है।
वो' खुशी खुशी, है' गले मिला, न गिला न कोई' मलाल है।।

वो' जिसे फ़लक की' तमन्ना' थी, है' चला ज़मीं से' वो' आज तो,
है' दुआ मिलें हैं' जो' चाहतें के नसीब राह मुहाल है।

किसी' बेवफ़ा से' नहीं गिला, जिसे' चाहकर भी' तो' ग़म मिला,
कभी' हाले' दिल भी' बयां करो, तू' खुशी की' जिंदा मिसाल है।।

मुझे' बस खुदा की' दुआ मिले, हो' करम मिरे भी' हबीब का,
मिरे' सामने जो' टिके कहां, मिरे' दुश्मनों की' मज़ाल है।।

मिरे' कातिलों को' सज़ा नहीं, है' गुनाह किसका' बता यही,
है' कहां अमन है' कहां चमन, यहां' सियासतों का' ये' हाल है।।

बड़ी' दूर चला मैं' जहान में, मुझे' मिला न कोई' भी' बावफ़ा,
को'ई' बता सही, कभी' 'दीप' को, ये' मचा हुआ जो' बबाल है।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'