सोमवार, 1 अक्तूबर 2018

मेरी रश्क़े क़मर, महफ़िले इश्क़ में

बह'र : २१२*८

मेरी' रश्के-क़मर, महफ़िले-इश्क़ में, तेरा' नज़रें उठाना ग़ज़ब हो गया।
देख तेरी अदा, गिर गये झूमकर, यूँ ते'रा मुस्कुराना ग़ज़ब हो गया।।

क्या नज़ारा था' वो, उस हसीं रात में, खूब रंगीन दिलकश ख़यालात में,
धड़कने रुक गईं, चाँद शरमा गया, रुख से पर्दा हटाना ग़ज़ब हो गया।।

मयकदों पे हुई मयकशी आज तक, ज़ाम पे ज़ाम साकी पिलाती रही,
जो नज़र की अता, रब ने' तुमको सनम, उस नज़र से पिलाना ग़ज़ब हो गया।।

दिल तलब़ग़ार था तू सितमगर सनम, तीर-ओ-तलवार की क्या ज़रूरत तुझे,
क़ातिलाना अदा मल्लिका हुस्न की, बर्क़ दिल पे गिराना ग़ज़ब हो गया।।

दिल की' दहलीज़ पे आ गये 'दीप' जब, तुम हमारे हुए, हम तुम्हारे हुए,
हमसफ़र हमनशीं रहगुज़र अपना' भी, इस जहाँ में फ़साना ग़ज़ब हो गया।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'