शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

मुक्तक भाग - १

१.
वफ़ा ईमान खुद्दारी, हुनर ज़ज़्बा चला जाता।
हमारी जान से बढकर, न कुछ ज्यादा चला जाता।
ज़रा सी बात पर तुमने, हमारा साथ छोड़ा है,
अगर तुम साथ चलते तो, तुम्हारा क्या चला जाता।

२.
कोई ताकत कोई चाहत, कोई धन का पुजारी है।
किसी को भूख इज़्ज़त की, कोई सुख का भिखारी है।
निभाने को निभा लेते हैं, रश्में सब ज़माने की
निभाना है अगर मुश्किल तो' वो ईमानदारी है।।

३.
दुआ मेरी है' ये रब से, मिले शुहरत जमाने में।
मुकाबिल आपके कोई न हो सूरत जमाने में।
खुदा तुमको अता कर दे, जहाँ की नेमतें सारी,
मुहाफ़िज़ आपकी हो 'दीप' ये कुदरत जमाने में।।

४.
विश्वगुरु संकल्पना का एक ही आधार है।
त्याग निष्ठा और समर्पण, बस यही पतवार है।
एकदंता, शत्रुहंता, जगनियंता साथ तो,
धर्मक्षेत्रे, कर्मक्षेत्रे विजय-पारावार है।

५.
रहो खुशहाल जीवन में, यही है कामना मेरी।
मिले सुख चैन सब तुमको है प्रभु से याचना मेरी।।
चलो सन्मार्ग पर हरदम, दिखाओ रास्ता सबको,
बनो यश-कीर्ति के भागी यही है भावना मेरी।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'