शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

नारी सम्मान

*विषय: नारी सम्मान*

*विधा: गद्य*

*"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।*
*यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।।"*
मनुस्मृति के अध्याय ३ की श्लोक संख्या ५६ से प्रारम्भ करते हुए मैं आज नारी सम्मान पर अपनी बात रखने जा रहा हूं। सभी पटल पर उपस्थित धर्मानुरागी सुसाहित्यकारों से शुभाशीष की अपेक्षा करता हूं और नारी सम्मान के प्रति अपनी आस्था का परिचय कराता हूं।

जैसा कि श्लोक से स्पष्ट है कि *"जहां स्त्रीजाति का आदर-सम्मान होता है, उनकी आवश्यकताओं-अपेक्षाओं की पूर्ति होती है, उस स्थान, समाज, तथा परिवार पर देवतागण प्रसन्न रहते हैं । जहां ऐसा नहीं होता और उनके प्रति तिरस्कारमय व्यवहार किया जाता है, वहां देवकृपा नहीं रहती है और वहां संपन्न किये गये कार्य सफल नहीं होते हैं ।"*

नारी समाज का एक सम्मानित अंग है। वैसे तो सम्मान के अधिकारी सभी होते हैं। नारी-पुरुष, बालक-वृद्ध, धनी-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित, सम्मान सभी को मिलना चाहिए। परन्तु नारी वर्ग को हमारी संस्कृति में सबसे अधिक सम्मान दिया गया है। नारी हमारी मां है, बहन है, बुआ है, भार्या है, अर्थात् सर्वथा पूज्यनीय है। इसी क्रम में गायक साधना जी के मुखारबिंदु से उच्चरित कुछ शब्द ध्यान में आते हैं।

*"नारी है नर की नारी,*
             *नारी है बहना प्यारी।*
 *नारी ने जन्म दियो है,*
             *नारी सबकी महतारी।।"*

हमारी समस्त पौराणिक कथाओं में मातृशक्ति को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है। हम सभी प्रत्येक दिन प्रयोग करने वाले अभिवादन सदृश शब्दों में भी मातृशक्ति काम नाम पहले लेते हैं। जैसे सीताराम, राधेश्याम आदि।

फिर भी दु:ख होता है जब नारी इतनी समर्पण की भावना रखते हुए भी समाज में प्रताड़ित की जाती है। एक दृष्टांत के माध्यम से आप सभी का ध्यान अपनी भावनाओं पर केंद्रित करना चाहता हूँ, *जब हम अपनी पत्नी को प्रताड़ना देते हैं या किसी कारणवश​ अपमानित करते हैं तो संभवतः उसके दो कारण हो सकते हैं,*
*१. या तो हम ये भूल जाते हैं कि आज जो हमारी बेटी या बहन है कल वह भी किसी की पत्नी बनेगी और जब उस पर यही स्थिति आयेगी तो उसे कैसा लगेगा या हमारे मन-मस्तिष्क पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा।*
*२. या तो फिर हम मानव नहीं है, हमारे हृदय में मानवता नहीं है।*

एक साधारण से सिद्धांत को मैं यहां पर प्रस्तुत कर रहा हूं जो मैंने अपने अध्ययन काल में *भूगोल और इतिहास में संबंध* में सीखा था। *"आज का भूगोल कल का इतिहास बन जाता है"* ये सिद्धांत मैं अपनी मातृशक्तियों को समर्पित करता हूं जो नारी होकर नारी का सम्मान नहीं करती हैं। समाज में नारी को मात्र पुरुष वर्ग ने ही नहीं अपितु नारी वर्ग ने भी अपमानित किया है। सास-बहू, भाभी-ननद आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

एक दृष्टि समाज के उस अंग पर डालते चलते हैं जो समाज में एक दंश है, जिसका प्रभाव हमसे जीने का अधिकार ही छीन लेता है। अमानवीय कृत्यों को करने वाले इन लोगों को मानव कहना भी अनुचित होगा, क्योंकि मानव वह जीव है जिसमें मानवता है। जिसमें मानवता का अभाव  है वह मानव बिना सींग और पूँछ का जानवर  है। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि *"वह तो पशु है अब छोड़ इसे, पर सींग पूँछ बिनु बूँचा है।"*

और चलते चलते एक दृष्टि मनुस्मृति के अध्याय ३ श्लोक संख्या ६० पर डालते हुए अपनी बात सम्पन्न करता हूं।

*"सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च ।*
*यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ।।"*

अर्थात् जिस कुल में प्रतिदिन ही पत्नी द्वारा पति संतुष्ट रखा जाता है और उसी प्रकार पति भी पत्नी को संतुष्ट रखता है, उस कुल का भला सुनिश्चित है । ऐसे परिवार की प्रगति अवश्यंभावी है ।

*-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'*