शनिवार, 6 अक्तूबर 2018

नित प्रातः अरुण हम अरुण सदा....

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*आज का विषय : कृतित्व और व्यक्तित्व
(आद० अरुण श्रीवास्तव 'अर्णव' जी)

विधा: मुक्त

अलंकार: अनुप्रास, यमक और उपमा।

नित प्रात अरुण सम अरुण सदा,
अपना प्रकाश फैलाते हैं।
संगम के सभी सृजनकारों का,
प्रतिपल हर्ष बढ़ाते हैं।
कितने उपकार किए अब तक,
ये कैसे आज बखान करूं,
सादर साभारोसानुराग,
दोनों ही कर जुड़ जाते हैं।।

जब तक हैं सूरज चांद यहां,
जब तक सावन और फाग रहे।
जब तक केसर की क्यारी हैं,
जब तक आमों के बाग रहे।
आशीर्वचन कहते रहना,
जब तक है संगम की छाया,
गंगा है, जब तक जमुना है,
मुझ पर भारी अनुराग रहे।।

है यही कामना ईश्वर से,
संसर्गों का आयाम करे।
सतपथ पर चले लेखनी और,
ऐसे ही नित व्यायाम करे।
मन में सबके छा जाओ फिर,
अनुसरण आपका हो जग में,
जीवन में मिले सफलता भी,
जग में बहुचर्चित नाम करे।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

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