शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

गरल

"गरल"

जैसा कि हम व्यावहारिक जीवन में देखते हैं कि गरल (विष) का कार्य है, अचैतन्यता देना। गरल हमारे रग-रग में अपना प्रभाव करता है और शरीर की कोशिकाओं को अचैतन्य बनाता है।
यदि हम कहना चाहें तो हम ये भी कह सकते हैं कि चराचर में व्याप्त वह प्रत्येक वस्तु गरल है जो किसी अन्य वस्तु को अचैतन्यता प्रदान करती है या अचैतन्यता का कारण बनती है। समाज में व्याप्त ऐसी कुरीतियों को भी गरल की संज्ञा दी जाती है जो हमारी सभ्यता और संस्कृति की विनाशक हैं। समाज में हो रहे अनैतिक, अमानवीय कृत्य और व्यवहार को भी गरल कहना ही उचित होगा। कहते हैं कि जिसका जो स्वभाव, जो प्रभाव होता है वह दिखाता अवश्य है, ठीक उसी प्रकार गरल भी अपना प्रभाव दिखाता ही है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में लिखा है कि

"भलो भलाइहि पै लहइ, लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरता गरल सराहिअ मीचु।।"

अर्थात् जिसका जो स्वभाव है वैसा ही उसका प्रभाव दिखता है। जिस प्रकार अमृत अपने अमरत्व और विष मृत्यु के लिए जाना जाता है।

इसके साथ ही एक विषय पर और दृष्टिपात करना आवश्यक हो जाता है कि जो सज्जन पुरुष (अमृत) हैं उन पर गरल (कुरीतियों) का कोई प्रभाव नहीं होता। रहीम जी के एक दोहे पर दृष्टिपात करते हैं

"जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।"

अर्थात् जो लोग उत्तम प्रकृति (स्वभाव) के हैं, उन पर नीचता कभी अपना प्रभाव नहीं दिखा पाती, जिस प्रकार चंदन के पेड़ में सर्पों के लटके रहने से भी विष का प्रभाव नहीं होता है।
दूसरी बात यह है कि जब भगवान की कृपा होती है तब भी गरल का कोई प्रभाव नहीं होता है, तुलसीदास विरचित कुछ पंक्तियां देखिए।

"गरल सुधा रिपु करहि मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई।।"

अर्थात् भगवान का नाम लेकर हनुमान जी ने जब लंका में प्रवेश किया तब कोई कार्य भला कैसे न सिद्ध होता। क्योंकि जब भगवान की कृपा होती है, तब गरल अमृत बन जाता है, शत्रु मित्रवत व्यवहार करने लगता है, समुद्र गाय के खुर के समान प्रतीत होता है और आग में भी शीतलता का अनुभव प्राप्त होने लगता है।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'