शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

तन धरा पर ही धरा रह जाएगा...

*हिंदी में ग़ज़ल लिखने का प्रयास*

मापनी- २१२२ २१२२ २१२
जो सुना सब अनसुना रह जाएगा।
मन के मनके में दबा रह जाएगा।

प्रीति सी परिपूर्ण डोरी में बँधो,
साथ सब अपना सगा रह जाएगा।।

नीति नियमों का नया निर्माण हो,
सब पुराना भी कहा रह जाएगा।।

भेद भारत का कभी भी ले सके,
पाक के मन में बसा रह जाएगा।।

वेद शास्त्रों औ पुराणों में लिखा,
तन धरा पर ही धरा रह जाएगा।

मातु धरती हाथ धरती शीश पे,
'दीप' गीतों में लिखा रह जाएगा।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'