शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

प्रेम

*विषय: प्रेम धन*
*विधा: मुक्त*

प्रेम को परिभाषित कर पाना अत्यंत दुष्कर है। ढाई अक्षर का शब्द 'प्रेम' समस्त चराचर को एक करने की सामर्थ्य रखता है। हमारे समाज, कवि, साहित्यकार और दार्शनिकों ने समय समय पर प्रेम को समझने समझाने का प्रयास किया। आज हम उस प्रेम धन पर अपनी बात रखने जा रहे हैं।

प्रेम विश्वास है, प्रेम त्याग है, प्रेम बलिदान है, प्रेम ममता है, प्रेम सम्मान है, प्रेम वात्सल्य है, प्रेम अनुभूति है, प्रेम बंधन है।

बहुत सौभाग्यशाली होते हैं जिन्हें प्रेम धन की पूंजी प्राप्त होती है। प्रेम की कुछ झलकियां हम यहां प्रस्तुत​कर रहे हैं।

"प्रेम राधा ने कृष्ण से किया था। कहते कि एक बार रूक्मिणी ने श्रीकृष्ण जी को गर्म दूध पीने हेतु दिया, विदित हो कि राधा जी को छाले पड़ गए थे।"

"प्रेम मीरा ने गिरधर से किया था। राणा जी द्वारा विष दिए जाने पर मीरा ने विषपान कर लिया और गिरधर जी की कृपा से उनका कुछ भी अनर्थ नहीं हुआ।"

"प्रेम शबरी ने राम से किया था। भगवान राम ने जंगल में शबरी के जूठे बेर खाए थे।"

"प्रेम सीता जी ने राम से किया था। लंकापति रावण सीता जी के सतीत्व को डिगा नहीं सका।"

"प्रेम भगत सिंह ने किया था। हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया। हमारे सभी देशभक्तों को अपनी मातृभूमि से प्रेम है।"

"सावित्री ने सत्यवान से किया था। पति के प्राणों को यमराज से भी वापस लौटा लिया।"

प्रेम धन असीम है, वर्णन कर पाना बहुत कठिन है। आप लोगों के समझ कुछ प्रेम के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'