शनिवार, 6 अक्तूबर 2018

वतन की राह में जिसने लहू बहाया है...

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बह्र-ए-मुज़तस मुसम्मन मखबून महज़ूफ

मुफ़ाइलुन + फ़यलातुन  + मुफ़ाइलुन +  फ़ेलुन

१२१२  ११२२  १२१२  २२

वतन की'राह में' जिसने लहू बहाया है।
अमरशहीदों में' उसका ही' नाम आया है।।

रहेगा' फ़ख्र वतन को भी' सरफ़रोशों पे,
खुशी खुशी ही' क़ज़ा को गले लगाया है।।

क़मर सितारों' की करते वो' जुस्तजू भी क्या,
जिन्होंने' दिल में' वतन को ही' जब बसाया है।।

खुदा गवाह जुदा हो गए जो' अपनों से,
शहादतों के' सबब अश्क़ ना बहाया है।।

कभी जो' आया' है' ख़त सरहदों से' साजन का,
उसी ने आज यहां हाले' दिल सुनाया है।।

सदा रहेगा'वतन कर्ज़दार उसका भी,
फ़ना वतन पे' हुआ जिसका लाल जाया है।।

लिखूं मैं' दर्द भी' नादान बेगुनाहों का,
उठा है' सर से' पिता का भी' जिनके साया है।।

करें सबर तो' बता किस कदर करे वो भी,
ज़नाजा बाप के सानों ने' जब उठाया है।।

लगी थी' भीड़ ओ' खामोशियां भी' छाईं थीं,
वहां भी' 'दीप' का' दिल बेकरार पाया है।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

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