बुधवार, 3 अक्तूबर 2018

वफ़ादा होकर वफ़ा कर न पाए....

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[बहर-ए-मुत्कारिब मुसम्मन सालिम]

वफ़ादार  होकर   वफ़ा   कर  न  पाए।
मगर उनको दिल से जुदा कर न पाए।।

हमारी  तो  ज़ाँ   माँग  ली   है  उन्होंने,
जिन्हें चाह कर भी मना कर न  पाए।।

हज़ारों   दुआएँ   ख़ुदा  से   हैं   माँगी,
मगर ख़ुदकुशी की दुआ कर न पाए।।

तमन्ना   तुम्हारे  तो   दीदार   की  थी,
तुम्हारा पता  ही   पता कर  न पाए।।

जहाँ में हज़ारों  हुनर  सीख  कर  भी,
महज़ हम किसी से दग़ा कर न पाए।।

शिकायत हमेशा रही हमको फिर भी,
कभी  जिंदगी  से  गिला कर न पाए।।

ख़ता  'दीप'  की  सिर्फ़  इतनी  रही  है,
उन्हें अपनी साँसें  अता कर  न  पाए।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'