बुधवार, 21 अगस्त 2019

साथ देता नहीं जाने क्यूँ मुकद्दर मेरा

ता  है हर इक ख़्वाब ही अक्सर मेरा।
साथ देता नहीं जाने क्यूँ मुकद्दर मेरा।।

जिंदगी रंग दिखाती है न जाने कितने,
आज कल मुझसे ख़फ़ा रहता है दिलबर मेरा।।

शहर के लोग सिफ़ारिश में उन्हीं की आये,
बेसबब ही जो जला कर गये हैं घर मेरा।।

लौट आना तो नहीं उनका रहा मुमकिन अब,
हाल होना है अभी इससे भी बदतर मेरा।।

'दीप' फुरक़त में उनकी कैसे जला वर्षों से,
देख लो हाल कभी ख़ुद ही अब आ कर मेरा।।

-प्रदीप कुमार पाण्डेय 'दीप'

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